Sunday, February 1, 2026

प्रकृति पूजा, शिव व देवी की पूजा आदि कई समानताएं हैं सरना व सनातन में

             प्रकृति पूजा, शिव व देवी की पूजा आदि कई समानताएं हैं सरना व सनातन में

                                        -अशोक “प्रवृद्ध”

                          लेखक, आध्यात्मिक चिन्तक और साहित्यकार


उत्कल मेल, 31 जनवरी 2026 



जनवरी 2026 में द्विदिवसीय रांची, झारखण्ड यात्रा के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के द्वारा जनजाति संवाद कार्यक्रम में सरना पूजा- पद्धति की सनातन धर्म से समानता को लेकर की गई टिप्पणी के बाद यह मुद्दा बहस के केंद्र में है। कार्यक्रम के दूसरे दिन 24 जनवरी को जनजाति संवाद कार्यक्रम में मोहन भागवत ने स्पष्ट रूप से कहा कि सरना एक पूजा पद्धति है, न कि कोई अलग धर्म हिन्दू धर्म की परिभाषा देते हुए भागवत ने तर्क दिया कि हिन्दू धर्म किसी विशेष पूजा पद्धति का नाम नहीं है, बल्कि यह एक समावेशी जीवन पद्धति और साथ रहने का तरीका है। उन्होंने आदिवासियों को सनातन संस्कृति और धर्म का मूल आधार बताया। उनके अनुसार, जिस दिन जनजाति समाप्त होगी, उसी दिन सनातन भी समाप्त हो जाएगा। उन्होंने जोर दिया कि सरना को अलग धर्म के रूप में देखना समाज को तोड़ने का प्रयास है और बाहरी ताकतों को शोषण का मौका देना है। भले ही कोई पेड़ की पूजा करे या पहाड़ की, सभी का भाव एक ही है, जो सनातन मूल्यों से जुड़ा है।

उनके इन बयानों पर प्रक्रिया स्वरूप पूरे झारखण्ड में बयानों की बाढ़ आ गई, अनेक राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं, जहां विपक्ष ने सरना धर्म कोड की मांग को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रुख की आलोचना की, वहीं अनेक जनजातीय नेताओं ने उनके बयान का समर्थन करते हुए कहा कि कुछ वर्ष पूर्व तक हम जनजातीय बन्धु भी अपने आंगन में चीरा झंडा नहीं बल्कि महावीरी झंडा फहराया करते थे, आंगन में तुलसी चबूतरा में लगे तुलसी माता की पूजा किया करते थे और हिन्दू पर्व- त्योहारों में ख़ुशी से भाग लेते थे और तत्संबंधी पूजा पाठ विधि- विधानपूर्वक करते था आज भी अधिकांश सरना आदिवासी रामनवमी, नवरात्र, महाशिवरात्रि, होली आदि पर्व त्योहारों का आयोजन करते हैं और पूजा -पाठ में भाग लेते हैं।

 

उत्कल मेल, नई दिल्ली, 31 जनवरी 2026 

 

उल्लेखनीय है कि सरना शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अर्थात धार्मिक पहचान के रूप में उदय 1930 के दशक में हुआ था, जब सरना धर्म अर्थात सरनावाद को एक सामूहिक धार्मिक पहचान के रूप में छोटा नागपुर क्षेत्र वर्तमान झारखण्ड में प्रचारित किया गया था। सरना शब्द मूल रूप से मुंडारी भाषा के शब्द सर से निकला है, जिसका अर्थ पवित्र साल वृक्षों का झुरमुट होता है। परंपरागत रूप से यह शब्द आदिवासियों के पूजा स्थल (सरना स्थल) को संदर्भित करता है। हालांकि यह मूल रूप से मुंडारी शब्द है, लेकिन कालांतर में उरांव, हो आदि अन्य जनजातियों ने भी इसे अपनी धार्मिक पहचान के रूप में अपनाया, जो आदिवासियों में इसकी सामूहिक स्वीकार्यता का द्योतक है। सरकारी दस्तावेजों में 1970 के दशक से आदिवासियों ने जनगणना के दौरान अपनी धार्मिक पहचान सरना के रूप में दर्ज करानी शुरू की। 1971 की जनगणना में पहली बार लगभग 3,00,000 लोगों ने स्वयं को सरना धर्मावलंबी बताया था। सरना कोड की पहली औपचारिक मांग 1980 के दशक में तत्कालीन बिहार वर्तमान झारखण्ड प्रदेश के लोहरदगा संसदीय क्षेत्र के सांसद कार्तिक उरांव द्वारा की गई थी। वस्तुतः, एक विशिष्ट पूजा स्थल के रूप में यह शब्द प्राचीन काल से प्रचलित है, लेकिन एक संगठित धार्मिक शब्द के रूप में इसका व्यापक प्रयोग 1930 के दशक से शुरू हुआ।1980 के दशक में इसकी मांग शुरू है, और अब यह मांग एक विकराल रूप धारण कर चुकी है।  

 

बिरसा का गांडीव, 30 जनवरी 2026 

 
सरना और सनातन हिन्दू धर्म के बीच संबंध को लेकर कई मत और दृष्टिकोण प्रचलित हैं अनेक आदिवासी संगठनों और विद्वानों का तर्क है कि सरना एक पूरी तरह से स्वतंत्र प्रकृति आधारित धर्म है। इनके अनुसार सरना धर्म में मूर्तियों की पूजा नहीं होती, बल्कि पेड़ों, पहाड़ों और नदियों (प्रकृति) की सीधे पूजा की जाती है। इसका कोई धर्मग्रंथ नहीं है। सनातन धर्म के वेद, उपनिषद आदि ग्रंथों के विपरीत सरना की परंपराएं मौखिक हैं और इनमें कोई लिखित धर्मग्रंथ नहीं होता। सरना समाज में हिन्दू धर्म जैसी जाति अथवा वर्ण व्यवस्था नहीं होती है। सरना मान्यताओं में आमतौर पर पुनर्जन्म या कर्म के सिद्धांत की वह अवधारणा नहीं है जो सनातन धर्म का मूल आधार है। अनेक आदिवासी लोग अंतिम संस्कार में मृतक का शव दाह करते हैं, लेकिन कई आदिवासी समुदायों में शवों को जलाने के बजाय दफनाने की परंपरा है। सरना को सनातन का हिस्सा मानने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे कई धार्मिक व सांस्कृतिक संगठनों का मानना है कि सरना वास्तव में सनातन धर्म का ही एक वनवासी रूप है। प्राचीन ऋषि- मुनियों के अरण्य संस्कृति के अभिन्न अंग हैं सनातन धर्म में भी तुलसी, पीपल, पर्वत, नदियां आदि प्रकृति की पूजा का विधान है, इसलिए यह भिन्न नहीं है। दोनों के ही साझा सांस्कृतिक मूल्य हैं। दोनों ही जीवन के प्रति आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखते हैं और कई स्थानीय देवता व परंपराएं आपस में मिलती-जुलती हैं। दोनों का ऐतिहासिक जुड़ाव भी समान है। कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि आदिवासी प्राचीन काल से ही हिन्दू समाज का अभिन्न अंग रहे हैं, जिसका प्रमाण रामायण-महाभारत आदि प्राचीन ग्रंथों में भी अंकित मिलते हैं।


वर्तमान में झारखण्ड जैसे राज्यों में सरना धर्म कोड की मांग जोर पकड़ रही है ताकि आगामी जनगणना में आदिवासियों को अपनी एक अलग धार्मिक पहचान दर्ज करने का विकल्प मिल सके। आधिकारिक तौर पर अभी इसे एक अलग धर्म की मान्यता नहीं मिली है और जनगणना के दौरान यह हिन्दू अथवा अथवा अन्य श्रेणी में दर्ज किया जाता रहा है। सरना और सनातन दोनों ही प्राचीन और सांस्कृतिक गहराई से जुड़े हुए हैं। दोनों धर्मों में एकता और समरसता का भाव है, और दोनों ही धर्मों में प्रकृति और जीवन की महत्ता को माना जाता है। सरना धर्म में भी एक सर्वशक्तिमान शक्ति को माना जाता है, जिसे थान कहा जाता है, जबकि सनातन धर्म में भगवान (भूमि, गगन, वायु, आकाश अर्थात अंतरिश अग्नि व नीर) को माना जाता है। महादेव, पार्वती, श्रीराम, बजरंग बली हनुमान आदि अनेक सनातन देवी- देवता पूज्य माने जाते हैं। 

 

प्रातः आवाज, रांची व हजारीबाग, 31 जनवरी 2026 

इसमें कोई शक नहीं कि इन दोनों धर्मों के बीच एकता और समानता को देखते हुए इन दोनों धर्मों को एक दूसरे के साथ जोड़कर एक नई दिशा दी जा सकती है। सनातन धर्म में प्रकृति पूजा का बहुत महत्व है। वेद, उपनिषद, पुराण आदि ग्रंथों में भी पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, जल, वायु, अग्नि आदि प्रकृति के विभिन्न तत्वों की महता, उपयोगिता के मद्देनजर उनके प्रति पूज्य भाव दिखलाया गया है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने प्रकृति को देवतुल्य अर्थात भगवान का रूप माना है और उसकी पूजा करने का महत्व बताया है। सूर्य को भगवान सूर्य नारायण, चंद्रमा को भगवान चंद्रमा, और पृथ्वी को माता कहा जाता है सनातन धर्म में प्रकृति पूजा का बहुत महत्व है, और यह सरना धर्म के साथ एक समानता है। दोनों धर्मों में प्रकृति की पूजा और आदर का महत्व है। सरना धर्म में भी महादेव शिव और देवी की पूजा का महत्व है। आदिवासी समुदाय में शिव को बड़ा देव और देवी को जगत जनेनी कहा जाता है। सरना धर्म में प्रकृति की पूजा के साथ-साथ शिव और देवी की पूजा भी की जाती है, जो कि सनातन धर्म के साथ एक और समानता है। दोनों धर्मों में शिव और देवी की पूजा का महत्व है, और दोनों ही धर्मों में इनको शक्ति और प्राकृतिक ऊर्जा के रूप में माना जाता है। इस तरह सरना धर्म को सनातन धर्म का एक हिस्सा अथवा आदिवासी हिन्दू धर्म माना जा सकता है, क्योंकि इसमें आदिवासी संस्कृति और हिन्दू धर्म के तत्वों का मिश्रण है। इसमें प्रकृति पूजा, शिव व देवी की पूजा, और वेदों का महत्व आदि सनातन धर्म के कई तत्व शामिल हैं। कई आदिवासी समुदाय खुद को हिन्दू मानते हैं और सरना धर्म को अपना धर्म मानते हैं। विद्वानों के अनुसार वेदों पर आधारित सनातन वैदिक धर्म को सबसे प्राचीन और मूल धर्म माना जाता है, इसमें परमात्मा की एकता और सृष्टि के नियमों का महत्व है। सनातन धर्म को परमात्मा द्वारा बनाया गया माना जाता है, जबकि अन्य पंथ या मजहब मानव निर्मित हो सकते हैं। 



 

Sunday, January 18, 2026

सिरासीता धाम ककड़ोलता - अशोक 'प्रवृद्ध'

                                                    सिरासीता धाम ककड़ोलता 

                                                                 - अशोक 'प्रवृद्ध'


                                          

                           नया इंडिया, दिनांक- 2 फरवरी 2023 


महाप्रलय के पश्चात आदिवासी समुदाय की उत्पति की कथा झारखण्ड प्रान्त के गुमला जिलान्तर्गत डुमरी प्रखण्ड के आकाशी ग्राम अवस्थित सिरासीता नाले से जुड़ी हुई है। सिरासिता नाले को ककड़ोलता के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि जब- जब पृथ्वी पर अधर्म और पाप में वृद्धि हुई है, तब-तब पृथ्वी पर प्रलय हुआ है। और उस प्रलय के बाद आदिवासी सरना धर्मावलंबियों का झारखण्ड के गुमला जिला के डुमरी प्रखण्ड के आकासी ग्राम अवस्थित इस धार्मिक स्थल सिरासिता नाले ककड़ोलता से हुई है। अर्थात मानव की उत्पत्ति यहीं हुई है। नदियों, ब्रुक, ब्रुकलेट्स और जंगल से घिरे झारखण्ड राज्य के पश्चिमी सीमा पर स्थित इस स्थल के पूर्वी सीमा में गुमला जिला का चैनपुर प्रखण्ड, उत्तर सीमा में लातेहार जिला पूर्ववर्ती पलामू का महुआडांड़ प्रखण्ड और दक्षिण-पश्चिम में छत्तीसगढ़ राज्य की सीमा है। झारखण्ड की राजधानी राँची से 175 किलोमीटर और गुमला जिला मुख्यालय से 75 किलोमीटर दूर एक ऊंची पहाडी के तले सिरासीता नाला नामक स्थल आदिवासी समाज की आस्था और विश्वास से जुड़ा है।

      

नया इंडिया, दिनांक- 2 फरवरी 2023 



कहा जाता है कि 1000 मीटर ऊंचे पहाड़ पर इसका मुख्य स्रोत है। परन्तु पहाडी के नीचे अवस्थित आदिवासी समाज की आस्था और विश्वास से जुड़े इस स्थल पर प्रतिवर्ष फरवरी महीने के प्रथम गुरुवार को सामूहिक धार्मिक पूजा-अर्चना सह मेले का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष 2023 में फरवरी का वह पहला गुरुवार 2 फरवरी को पड़ रहा है। 2 फरवरी को यहाँ सिरासीता नाले के पूजन के लिए स्थानीय, धार्मिक और प्रशासनिक स्तर पर विशेष तैयारी की जा रही है। इस मेले में बिहार, छतीसगढ़, असम, बंगाल, मध्य प्रदेश, ओडिसा, नेपाल के अतिरिक्त झारखण्ड के विभिन्न जिलों से लाखों आदिवासी शामिल होते हैं। श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़ के साथ समाज के अगुआ, धर्म गुरूगण भी शामिल होते हैं। श्रद्धालु जन पूजा- अर्चना कर मनोवांछित फल प्राप्ति की कामना करते हैं, याचना करते हैं। मान्यता है कि यहाँ जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह अवश्य ही पूर्ण होती है।

सिरासीता धाम, ककड़ोलता से सम्बन्धित अनेक लोक कथाएं, किम्बदन्तियाँ प्रचलित हैं। पाहन, माती, सोखा व पुजारीगण आदि विभिन्न धार्मिक कृत्यों के बीच जनजाति समुदाय के उद्भव से संबंधित धर्म गाथा गाई जाती है। दंडा- कट्ठा या भेलवाफरी पूजा के समय इस उद्भव धर्मगाथा तथा असुर अवदान के गीतों को गाया जाना एक प्रथा बन चुकी है। पूर्वजों की यह मूल कहानी बेलातपुर के राजा एवं एक राक्षस से संबंधित है। कथा के अनुसार बेलातपुर नामक स्थान में एक राक्षस रहता था, जो वहाँ के लोगों को अपना भोजन नित्य ही बनाया करता था। वह अपने निकट से गुजरने वाले लोगों को मारकर खा जाता था।

इस संकट से निबटने के लिए वहाँ के राजा एवं राक्षस के बीच एक लड़ाई हुई और दोनों के बीच एक समझौता हुआ। राजा और राक्षस के मध्य हुई समझौते के अनुसार बेलातपुर के लोगों को राक्षस को प्रतिदिन भरपेट भोजन के रूप में चावल आदि भोज्य पदार्थ देना पड़ता था। इसके लिए प्रतिदिन बेलातपुर के एक परिवार के सदस्य को सैका चावल के साथ राक्षस के पास जाना पड़ता था, लेकिन भोज्य पदार्थ लेकर जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को राक्षस निगल जाता था। एक दिन एक विधवा बुढ़िया के पुत्र की बारी आई। बुढ़िया के पुत्र का नाम धर्मेश (धर्मेस) था, और उसकी बहूँ अर्थात धर्मस की पत्नी का नाम पार्वती था। बुढ़िया ने रोकर अपने पुत्र को जाने से मना किया, परन्तु उसके पुत्र ने नहीं मानी और 12 मन की तलवार उठाई, तेरह मन का भला लिया। और जब छकड़े को चावल से भरकर चला तो राक्षस को तीन कोस दूर से ही बैलगाड़ी की घंटी की भयानक आवाज सुनाई पड़ने लगी।

दूर से ही राक्षस को लड़के ने कहा – अपना मुंह खोलो और मुझे भी खाओ। राक्षस ने यह सुन जब अपना मुंह खोला तो तब लड़के ने उसके मुंह में भाला ठूंस दिया, और तलवार से राक्षस को मार डाला। यह देख धर्मेश ने सोचा कि जब राक्षस का सड़ेगा, तब उसकी दुर्गन्ध से मनुष्य खाना-पीना नहीं कर सकेंगे। इसलिए पाप के प्रतीक राक्षस के शव को अग्नि वर्षा करके नष्ट कर देना चाहिए। धर्मेश की पत्नी पार्वती दयालु थी, वह नहीं चाहती थी कि अग्निवर्षा से सृष्टि का नाश हो। उसने अपने पति धर्मेश से कहा छोटे कटोरे से अग्नि बरसाओ। तब धर्मेश ने हनुमान को आदेश देते हुए कहा कि तुम सदा मेरे साथ रहना। जब मैं अग्निवर्षा करूं तो तुम ढोल पीटना । जिससे लोग सतर्क होकर अपनी सुरक्षा करें। पार्वती ने अपने पति से आधे कटोरे में अग्निवर्षा करने के लिए कहा था, किन्तु धर्मेश ने पीतल की थाली भरकर आग बरसा दी और हनुमान तेला नामक केंद्र फल खाने में मग्न रहे, ढोल पीटना भूल गए। तब भयंकर आग लगी । सभी देश, वनस्पति, प्राणी भस्म हो गए, लेकिन पार्वती ने एक नर एवं एक नारी भाई-बहन को गंगला झाड़ियों के बीच, जिसे सिरा सीता कहा जाता है, केंकड़े के बिल में छुपा दिया और उन्हें मसूर की आधा दाल खाने को दिया। वे इस पर 7 दिन और 7 रात जीवित रहे। तब धर्मेश ने पार्वती से कहा कि प्रसाद के चढ़ावे से ही देवताओं का भोजन होता है और प्रसाद चढ़ाने वाला कोई व्यक्ति नहीं होने के कारण मैं भूख से मर रहा हूँ।

इस पर पार्वती ने कहा मैंने आपसे थोड़ी अग्निवर्षा की प्रार्थना की थी, किन्तु आपने अत्यधिक अग्निवर्षा कर दी। अब मनुष्य कहां मिलेंगे, जो प्रसाद का चढ़ावा चढ़ाने आएंगे? तब धर्मेश ने पार्वती से प्रार्थना की। तब पार्वती ने बताया कि दो प्राणी गंगला वैद्य में छुपे हैं। यह सुन सोने की छड़ी लेकर धर्मेश चील्ह नामक एक पक्षी, कुत्ते लिलि, भूली और खैरी के साथ भैया बहन को ढूंढने निकले। तब कुत्तों ने मिलकर गंगला झाड़ी के बीच केकड़े के बिल के पास भूंकना शुरू किया। धर्मेश ने नर-नारी युग्म को पा लिया। और धर्मेश ने उन्हें हल दिया, बीज दिया। उनके लिए दिन-रात बनाए।लेकिन जब उन्होंने चावल की खेती शुरू की, तो एक ओर टिड्डियों ने और दूसरी और चूहे ने हानि पहुंचाने शुरू कर दी। इस पर धर्मेश ने इस भैया बहन युग्म से कहा कि कृषि की रक्षा के लिए दण्डा- कट्टा या भेलवाफरी पूजा करना चाहिए। इससे इस प्रकार की हानि नहीं होगी इससे नजर -गुजर से रक्षा होगी। यह बताकर धर्मेश ने भाई-बहन के बीच लकड़ी का एक धींगरा रख दिया और कहा कि ओ मेरे पौत्र! जब तुम इस लकड़ी के लट्ठे को पार कर उस तरफ जाकर सोओगे, तो मानव जाति बढ़ेगी। इस प्रकार प्रथम भैया बहन से उरांव जाति का विस्तार हुआ।

ककड़ोलता से सम्बन्धित एक अन्य कथा के अनुसार संसार में पाप में वृद्धि और धर्म का नाश होने लगा, तो इसे देख भगवान महादेव और माता पर्वती को अत्यंत दुःख हुआ। यह देख माता पार्वती का हृदयं दग्ध हो उठा, और उन्होंने महादेव से कहा कि अग्नि और जल से सम्पूर्ण पृथ्वी को भस्म कर दीजिए। पार्वती के कहने पर उन्होंने पाप से भरे इस पृथ्वी को जलाने की सहमति दे जताते हुए आग और पानी को पृथ्वी को जलाने के लिए भेजने गए। भेजने के पहले महादेव ने हनुमान से कहा कि मैं आग और पानी को दुनिया को जलाने के लिए भेज रहा हूँ, जब आधा पृथ्वी जल जाएगा, तब तुम जाकर डमरू को बजा देना, तो आग बुझ जाएगा, और पानी बरसना बंद हो जाएगा।

हनुमान को यह कहकर महादेव आग और पानी को पृथ्वी पर भेज दिए। पृथ्वी में अग्नि की वृद्धि होने से अत्यधिक ताप को सहन नहीं कर पाने के कारण मानव, पेड़-पौधा, पशु-पक्षी, जीव-जंतु सभी जल गए। और हनुमान उस समय चिटचिटी पेड़ पर चढ़कर फल खा आनन्द ले रहे थे। आग से चिटचिटी पेड़ जब झुलसा तो हनुमान हवा में उड़ते हुए उपर जाकर डमरू को बजाने लगे। तब तक सम्पूर्ण पृथ्वी पूरी तरह जल चुकी थी। यह सब देख कर माता पार्वती को भय सताने लगा कि आधी पृथ्वी को जलाने को कहा था तो पूर्ण सृष्टि को ही जला दिया। इस पृथ्वी से मानव जाति खत्म हो गया है। अब क्या होगा? कैसे होगा मानव का सृजन?

यह सोचते हुए माता पार्वती पृथ्वी को देखने लगी, तो अचानक उनकी नजर दो बच्चों पर पड़ी। उन्हें देखकर माता पार्वती की जान में जान लौट आई, और उन्होंने उन दोनों भाई और बहन को सिरा और सीता नामक समीप अवस्थित एक जलस्रोत, जिसे स्थानीय भाषा में नाला कहते है, नाले स्थल और गंगला खइड़ (झुंड) के बीच ककड़ोलता में छिपा दिया। तत्पश्चात जब महादेव वापस लौटे तो गुस्साई नजर से पार्वती ने उनसे कहा कि पूरा पृथ्वी जल गया। अब मानव जाति ढूंढें से कहाँ मिलेंगे? सम्पूर्ण संसार सुनसान हो गया। अब मानव का सृजन कैसे होगा? यह कह माता पार्वती ने मानव को ढूंढ लाने का आदेश देते हुए महादेव से कहा कि जब- तक आप मानव को ढूंढ नहीं लाते, तब तक मैं आपसे बात नहीं करूंगी। यह सुनकर महादेव पूरी पृथ्वी का भ्रमण करने लगे। सम्पूर्ण घूमने के बाद एक दिन महादेव अपने लिलि- भुली के संग सिरासिता नाले की ओर गये। गंगला खइड (झुंड) की ओर देख कर लिलि- भूली भूंकने लगी। उनके भौंकने के समय ही समय महादेव ने दोनों भाई-बहन को ककड़ोलता में घुसते हुए देख लिया, और वे दोनों भाई- बहन को लेकर पार्वती के पास पहुंचे और पार्वती को बताया कि दोनों भाई -बहन को सिरासिता नाले के गंगला खइड़ से ढूंढ़कर ला रहा हूँ।

इसके बाद महादेव और पार्वती ने दोनों को पाल पोसकर बड़ा किया। जिसके बाद मानव की उत्पत्ति शुरू हुई। यही कारण है कि आदिवासियों में मान्यता है कि आदिवासियों के पुरखों की उत्पति सिरासिता नाले के ककड़ोलता से ही हुई है, और यही मानव उत्पत्ति स्थल है। यहाँ भक्ति भाव से पूजन– अर्चा से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। हाल के वर्षों में स्थानीय स्तर पर आरम्भ की गई प्रार्थना सभाओं में भी सिरासिता नाले के ककड़ोलता को ही मानव उत्पत्ति स्थल मानकर प्रार्थना की जाती है। स्थानीय स्तर पर उरांव भाषा कुडुख में गाई जाने वाली गीतों- सिरा-सिता नाल नू, ई उल्ला जुड़ी ददा बआ लइक्कन, आदि गीतों और लोक कथाओं में भी सिरासिता नाले व ककड़ोलता से सम्बन्धित इस कथा की पुष्टि ही होती है।

बहरहाल जनजातीय मान्यता की इस धार्मिक स्थल, आस्था की प्रतीक, सरना आदिवासियों की बिश्वास स्थली सिरासिता नाला- ककड़ोलता और यहाँ तक पहुँचने का मार्ग आज भी विकास की बाट जोह रहा है। सुविधाओं को तरस रहा है। यहाँ तक लोगों को आवागमन करने में स्थानीय लोगों और पर्यटकों को काफी परेशानी, भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, फिर भी नित्यप्रति ही अनेक राज्यों के श्रद्धालु इस स्थल पर जमा होते है, पूजा – अर्चना करते हैं, और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की प्रार्थना व कामना करते हैं। समीप ही नौगाई डेम है, जहाँ स्थानीय स्तर पर नौकायन व मत्स्य पालन की सुविधाएँ विकसित किये जाने की सख्त आवश्यकता है। क्योंकि यहाँ भी काफी संख्या में स्थानीय शौकीनों व बाहरी पर्यटकों का आवाजाही लगा रहता है।






प्रकृति पूजा, शिव व देवी की पूजा आदि कई समानताएं हैं सरना व सनातन में

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