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Wednesday, April 15, 2020

वेद अर्थात ज्ञान से संयुक्त हैं सभी भारतीय सम्प्रदाय व पन्थ

वेद अर्थात ज्ञान से संयुक्त हैं सभी भारतीय सम्प्रदाय व पन्थ





वेद का शाब्दिक अर्थ ज्ञान है और सृष्टि के आरम्भिक काल में सभी मानव सनातन वैदिक धर्म पद्धति पर ही आलम्बित थे अर्थात परमेश्वरोक्त ग्रन्थ वेद में कहे अनुसार ही चलते थे। आदिकाल से ही शाश्वत्त रूप से चली आ रही इस सनातन वैदिक धर्म का ही सत्प्रभाव है कि भारत के वैदिक धर्म में से धर्म के जितने सम्प्रदाय, पंथ अथवा मजहब निकले अर्थात जन्म हुए, वे सब आज भी स्वयं को वेद के शाब्दिक अर्थ ज्ञान से सम्बद्ध रखा है और अपने आपको किसी न किसी प्रकार से ज्ञान से बांधे हुए रखा हुआ है। जैन धर्म का मूल जैन शब्द ज्ञान का ही अपभ्रंश रूप है अर्थात ज्ञान से ही बिगड़कर बना है । ध्यातव्य है कि संस्कृत में ज्ञान शब्द ज्यांन बोला जाता है, संस्कृत के जानकार विद्वान उसे ग्यान नहीं बोलते । ज्यांन और जैन में बहुत समरूपता को देखते हुए आसानी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इसी ज्यांन से जैन शब्द बना है । इसी प्रकार बौद्ध धर्म में बोध अर्थात ज्ञान से ही बौद्ध शब्द बना है, और फिर बुद्ध । बोधगया नामक स्थान में प्रयुक्त शब्द बोध यह स्पष्ट करता है कि यहीं पर अहिंसा के गुण गाने वाले महात्मा बुद्ध को बोध प्राप्त हो गया था। स्पष्ट है कि इसी लिए इस स्थान का नाम बोधगया नाम रखा । इससे यह भी स्पष्ट ही है कि बोध अर्थात महात्मा बुद्ध को इस स्थान पर ज्ञान हुआ था , और ज्ञान होते ही उन्होंने अपने धर्म का नाम भी ज्ञान के समानार्थक बौद्ध ही रखा। इसी प्रकार पंजाब में ज्ञान से ही सिक्ख अर्थात शिष्य धर्म की उत्पत्ति हुई है। शिष्य और ज्ञान का परस्पर अन्योन्याश्रित संबंध है । इसका अभिप्राय है कि ज्ञान की देवी की पूजा करना और ज्ञानार्जन कर संसार का उपकार करना प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति का मौलिक उद्देश्य रहा है । यही कारण रहा कि हमारे सभी प्राचीन भारतीय शासक ज्ञान के उपासक रहे ।
हमारे गौरवमयी भारत के इन ऐतिहासिक तथ्यों को, उनकी सनातनता को, उनके वैदिक रहस्यों को हमें समझने की आवश्यकता है, पुरातन भारत की सनातन वैदिक धर्मिता को समझाने के लिए अर्थात प्राचीन भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण पक्ष को स्पष्ट करने के लिए कोई विदेशी या भारत से द्वेष भाव रखने वाला विधर्मी इतिहासकार या लेखक हमें समझाने नहीं आएगा कि इन वैदिक ज्ञान का अर्थ क्या है ?

Sunday, October 19, 2014

शाश्वत्त सत्य


शाश्वत्त सत्य

शाश्वत्त का अर्थ है सदा रहने वाला अर्थात नित्य . जो नित्य है , वह सबके लिए है . किसी जाति अथवा किसी देश विशेष से इसका एकाकी सम्बन्ध नहीं हो सकता . इसी प्रकार शाश्वत्त सत्य का अर्थ हुआ सदा सत्य रहने वाला अर्थात नित्य निरन्तर सत्य .
यह सर्वविदित तथ्य है कि ज्ञान का मूल स्त्रोत परमात्मा है और परमात्मा का ज्ञान वेद ज्ञान है . यह ज्ञान प्राणीमात्र के लिए है .
जैसे एक बृक्ष , जिसका सम्बन्ध मूल से कट गया हो , कुछ काल तक तो हरा – भरा रह सकता है , परन्तु वह शीघ्र ही सूखने और सड़ने लग जाता है , ठीक इसी प्रकार मानव समाज भी , परमात्मा के मूल ज्ञान से विच्छिन्न हो सुख तथा सड़ रहा है. मानव समाज मानवता विहीन हो रहा है . इस मानव समाज को पुनः ज्ञान के उस मूल स्त्रोत वेद से जुड़ने पर ही आर्य सनातन वैदिक धर्मावाल्म्बी हिन्दू समाज और भारत , भारतीय व भारतीयता का कल्याण संभव है अन्यथा बेड़ा गर्क समझो .

Saturday, October 11, 2014

वेद के अनुसार व्रत

 वेद के अनुसार व्रत



सत्य विद्याओं की पुस्तक वेद हैं और धर्म की जिज्ञासा वाले के लिए वेद ही परम प्रमाण है ,अतः हमें वेद में ही देखना चाहिए कि वेद का इस विषय में क्या आदेश है ? वेद का आदेश है—-
व्रतं कृणुत !  ( यजुर्वेद  ४-११ )
व्रत करो , व्रत रखो , व्रत का पालन करो
ऐसा वेद का स्पष्ट आदेश है ,परन्तु कैसे व्रत करें ? वेद का व्रत से क्या तात्पर्य है ? वेद अपने अर्थों को स्वयं प्रकट करता है..वेद में व्रत का अर्थ है—-
अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छ्केयं तन्मे राध्यतां इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि  !!
  - यजुर्वेद  १–५

अर्थात - हे व्रतों के पालक प्रभो ! मैं व्रत धारण करूँगा , मैं उसे पूरा कर सकूँ , आप मुझे ऐसी शक्ति प्रदान करें… मेरा व्रत है—-मैं असत्य को छोड़कर सत्य को ग्रहण करता रहूँ

इस मन्त्र से स्पष्ट है कि वेद के अनुसार किसी बुराई को छोड़कर भलाई को ग्रहण करने का नाम व्रत है..शरीर को सुखाने का , रात्रि के १२ बजे तक भूखे मरने का नाम व्रत नहीं है..चारों वेदों में एक भी ऐसा मन्त्र नहीं मिलेगा जिसमे ऐसा विधान हो कि एकादशी , पूर्णमासी या करवा चौथ आदि का व्रत रखना चाहिए और ऐसा करने से पति की आयु बढ़ जायेगी … हाँ , व्रतों के करने से आयु घटेगी ऐसा मनुस्मृति में लिखा है-

पत्यौ जीवति तु या स्त्री उपवासव्रतं चरेत्  !
आयुष्यं बाधते भर्तुर्नरकं चैव गच्छति  !!
जो पति के जीवित रहते भूखा मरनेवाला व्रत करती है वह पति की आयु को कम करती है और मर कर नरक में जाती है …
अब देखें आचार्य चाणक्य क्या कहते है —

पत्युराज्ञां विना नारी उपोष्य व्रतचारिणी  !
आयुष्यं हरते भर्तुः सा नारी नरकं व्रजेत्  !!    ( चाणक्य नीति – १७–९ )

जो स्त्री पति की आज्ञा के बिना भूखों मरनेवाला व्रत रखती है , वह पति की आयु घटाती है और स्वयं महान कष्ट भोगती है …
अब कबीर के शब्द भी देखें —

राम नाम को छाडिके राखै करवा चौथि !
सो तो हवैगी सूकरी तिन्है राम सो कौथि !!
जो इश्वर के नाम को छोड़कर करवा चौथ का व्रत रखती है , वह मरकर सूकरी बनेगी
ज़रा विचार करें , एक तो व्रत करना और उसके परिणाम स्वरुप फिर दंड भोगना , यह कहाँ की बुद्धिमत्ता है ? अतः इस तर्कशून्य , अशास्त्रीय , वेदविरुद्ध करवा चौथ की प्रथा का परित्याग कर सच्चे व्रतों को अपने जीवन में धारण करते हुए अपने जीवन को सफल बनाने का उद्योग करों

Wednesday, January 29, 2014

वेद पठन - पाठन

वेद पठन- पाठन

वेद पढ़ने का अधिकार प्रत्येक मनुष्य को है ।
 शूद्र भी वेद पढ़ सकता है ।
जो व्यक्ति विद्या -विहीन हो वह वेद कैसे पढ़ेगा ? हाँ जो व्यक्ति पढ़ा- लिखा है वह वेद पढ़ सकता है । ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र सभी को वेद पढ़ने का अधिकार है । किसी को भी वेद पढ़ने से मना नहीं किया जा सकता ।
स्त्री -जाति को भी वेद पढ़ने की अधिकार है ।
वेद में सभी वर्णों के कर्तव्य बतलाए गए हैं ,मनुष्य मात्र के लिए उपदेश दिया गया है ।नारी जाति के लिए भी उपदेश दिया गया है ।अब यदि किसी वर्ण या नारी जाति को वेद के पठन -पाठन से मना कर दिया जाए तो उन्हें अपने कर्तव्य कर्मों का ज्ञान नहीं हो सकेगा । वे धर्मं , अर्थ , काम और मोक्ष के बारे में नहीं जान पाएंगे। इससे ईश्वरीय उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकेगी । ईश्वर का उद्देश्य मनुष्य मात्र को सत्य -ज्ञान का उपदेश देना है । अतः सब को वेद पढ़ने का अधिकार मानना पड़ेगा ।

वेद पढ़ने से लाभ
वेद पढ़ने से अनेक लाभ हैं । मनुष्य को सत्य का ज्ञान होता है । वेद पढ़कर ही मनुष्य धर्मं , अर्थ , काम और मोक्ष के बारे में ठीक -ठीक जान सकता है ।अपने कर्तव्य -कर्मों का ज्ञान वेद के पठन एवं पाठन से ही हो सकता है । वेद के पढ़ने से प्राप्त सत्य - ज्ञान द्वारा मानसिक शांति मिलती है ।मनुष्य सच्चा सुख प्राप्त करता है ।वेद पढ़ने से प्राप्त ज्ञान द्वारा आत्मा की उन्नति होती है । वह दिन पर दिन शुद्ध पवित्र होता जाता है । उसके ऐश्वर्य , यश , वर्चस आदि में वृद्धि होने लगती है । वैदिक ज्ञान से ही आत्मा की मुक्ति संभव है ।

वेद के नहीं पढ़ने से मनुष्य सत्य - ज्ञान के अभाव में मिथ्या -ज्ञान में फंस जाता है ।अधर्म को ही धर्मं समझ लेता है । अधर्म का ही आचरण करने लगता है । इसलिए दुःख उठता है । धर्मं , अर्थ , काम और मोक्ष की सिद्धि से दूर होता जाता है । उसका जीवन दुखी हो जाता है ।मानवशरीर पाना व्यर्थ हो जाता है । आज संसार में जो दुःख और अशांति फैली हुई है इसके मूल में मानव द्वारा वेद पठन - पाठन को छोड़ देना ही है ।

वेद विभाग और वेद के विषय

वेद-विभाग और वेद के विषय

वेद के चार विभाग हैं --जिन्हें ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद के नाम से जाना जाता है ।
इस विभाजन का आधार है --उन में वर्णित विषय ।

ऋग्वेद में विज्ञान का वर्णन है । ऋग्वेद विज्ञान कांड है ।
यजुर्वेद में क्रिया और गति का वर्णन है । यजुर्वेद कर्म कांड है । सामवेद में उपासना का वर्णन है। सामवेद उपासना कांड है । अथर्ववेद में ज्ञान का वर्णन है । अथर्ववेद ज्ञान कांड है ।

ऋग्वेद का विभाग मंडलों में किया गया है । मंडल का अनुवाकों में और अनुवाक का सूक्तों में विभाग किया गया है । ऋग्वेद में दस मंडल हैं । ऋग्वेद के प्रथम मंडल में २४ अनुवाकों के १९१ सूक्तों में १९७६ मंत्र हैं ।
द्वितीय मंडल में ४ अनुवाकों के ४३ सूक्तों में ४२९ मंत्र हैं ।
तृतीय मंडल में ५ अनुवाकों के ६२ सूक्तों में ६१७ मंत्र हैं ।
चतुर्थ मंडल में ५ अनुवाकों के ५८ सूक्तों में ५८९ मंत्र हैं ।
पंचम मंडल में ६ अनुवाकों के ८७ सूक्तों में ७२७ मंत्र हैं ।
षष्ठ मंडल में ६ अनुवाकों के ७५ सूक्तों में ७६५ मंत्र हैं ।
सप्तम मंडल में ६ अनुवाकों के १०४ सूक्तों में ८४१ मंत्र हैं ।
अष्टम मंडल में १० अनुवाकों के १०३ सूक्तों में १७२६ मंत्र हैं । नवम मंडल में ७ अनुवाकों के ११४ सूक्तों में १०९७ मंत्र हैं ।दसम मंडल में १२ अनुवाकों के १९१ सूक्तों में १७५४ मंत्र हैं । इस प्रकार ऋग्वेद में कुल मिला कर ---
दस मंडलों में ८५ अनुवाकों के १०२८ सूक्तों में १०५८९ मंत्र हैं ।


यजुर्वेद का विभाग अध्यायों में किया गया है । यजुर्वेद में कुल ४० अध्याय हैं । यजुर्वेद के ४० अध्यायों में कुल १९७५ मंत्र हैं ।

सामवेद का विभाग आर्चिकों में और आर्चिक का विभाग अध्यायों में किया गया है ।।सामवेद में कुल ३ आर्चिक हैं ---(१)छंद आर्चिक जिसे पूर्वार्चिक भी कहते हैं , (२)महानाम्न्यार्चिक और (३) उत्तरार्चिक ।
छंद आर्चिक या पूर्वार्चिक को अध्यायों में और अध्याय को दशतियों में विभाजन किया गया है ।महानाम्न्यार्चिक के और उपविभाग नहीं हैं ।उत्तरार्चिक को अध्यायों में और अध्याय को सूक्तों में विभाजन किया गया है ।
पूर्वार्चिक के ६ अध्यायों को ६४ दशतियों में बांटा गया है ।पूर्वार्चिक में कुल ६४० मंत्र हैं ।
महानाम्न्यार्चिक में १० मंत्र हैं ।
उत्तरार्चिक में कुल २२ अध्याय हैं ।इन २२ अध्यायों में कुल ४०२ सूक्त हैं , जिनमें १२२५ मंत्र हैं ।
सामवेद में कुल १८७५ मंत्र हैं ।


अथर्ववेद का विभाग कांडों और सूक्तों में किया गया है ।
अथर्ववेद में २० कांड है ।
इन कांडों का विभाजन सूक्तों में किया गया है ।
अथर्ववेद के ७३१ सूक्तों में ५९७७ मंत्र हैं ।

वेद के विषय

वेद में लौकिक और पारलौकिक सभी विषयों का उपदेश दिया गया है । मनुष्य धर्मं ,अर्थ और काम की सिद्धि प्राप्त कर सके , इसलिए ईश्वर ने उसे लौकिक विषयों का उपदेश दिया है । धर्मं , अर्थ और काम की सिद्धि के पश्चात् मानव मुक्ति की और भी बढ़ सके , मुक्ति प्राप्त कर सके इस उद्देश्य से पारलौकिक , आध्यात्मिक ज्ञान का उपदेश दिया है ।

लौकिक विषयों के उपदेश से कई लाभ है । लौकिक विषयों के उपदेश से ही तो मनुष्य को इस जीवन में सुख पूर्वक रहने का ज्ञान प्राप्त हो सकता है । बिना इस संसार के बारे में जाने - बूझे कोई व्यक्ति कैसे सुखी रह सकता है ? जैसे , किसी को स्वास्थ्य के नियमों का ज्ञान नहीं होगा तो वह बीमार रहेगा और दुःख पाएगा । जिसे लेन -देन का ज्ञान नहीं होगा उसका धन कोई ठग ले जाएगा । जिसे धन कमाने नहीं आएगा उसेभूखे मरना पड़ेगा , आदि - आदि । इन सभी के बारे में वेद उपदेश है ।

वेद में , मनुष्य की शरीर रचना , आरोग्य विज्ञान , चिकित्सा विज्ञान , प्राणि शास्त्र , वनस्पति विज्ञान , रसायन विज्ञान , भौतिक विज्ञान , गणित आदि विज्ञान की जितनी भी शाखा -उपशाखाएँ आज के वैज्ञानिक जानते हैं वे सभी तो है ही इनके अतिरिक्त ऐसे विज्ञान भी हैं जिनका पता आज के वैज्ञानिकों को नहीं है ।शिल्प कला , शिक्षण कला , संगीत कला , आदि सभी कलाओं का उपदेश भी वेद में पाया जाता है । नक्षत्र विद्या , कृषि विद्या , वाणिज्य विद्या आदि का वर्णन भी वेद में पाया जाता है । वेद सभी विद्याओं के ग्रन्थ हैं ।

वेद में जादू - टोने , झाड़ -फूंक , इन्द्रजाल आदि विद्याओं का वर्णन नहीं है । वेद में केवल सत्य विद्याओं का ही उपदेश है । वेद में मिथ्या विद्याओं का उपदेश नहीं है । मिथ्या विद्या उसे कहते हैं ---जो मानव को मिथ्या ज्ञान कराएँ अर्थात झूठा ज्ञान दें । जो चीज हो ही नहीं उसे होने का आभास करा दे । वास्तविक को अवास्तविक और अवास्तविक को वास्तविक होने का विश्वास दिला दे । जैसे --इंद्रजाल के द्वारा जो चीज न हो उसे प्रत्यक्षदिखा देते हैं । जैसे --किसी को बातों ही बातों में मोह लेना और उसका धन छल कपट से ले लेना । ये मिथ्या विद्याएँ कहलाएंगी ।

वेद में इतिहास नहीं है । वेद में इतिहास होने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता है । जब ईश्वर ने मनुष्य को बनाया उसी समय वेद का उपदेश भी दिया । अतः उस समय इतिहास की कोई बात हो ही नहीं सकती थी । इसीलिए वेद में इतिहास नहीं है ।

 वेद में किस्से कहानियां भी नहीं हैं । वेद में विशुद्ध ज्ञान के विषय ही है ।

पारलौकिक विद्या का अर्थ होता है -- वह विद्या जिसमें इस मानव जीवन के पहले या इसके बाद की स्थिति -परिस्थितियों का वर्णन हो । या यों कहें कि जन्म से पहले और मृत्यु के बाद की स्थिति के विषय । वेद में पारलौकिक विद्या के बारे में अनेक बातें बतलाईं गईं हैं । पाप -पुण्य , मृत्यु के पश्चात् कर्म फल के भोग के बारे में , पुनर्जन्म , मोक्ष आदि के बारे में वेद में उपदेश है ।

अध्यात्म विद्या -
जो विद्या आत्मा के बारे में बतलाती है उसे अध्यात्म विद्या कहते हैं । अध्यात्म विद्या में आत्मा परमात्मा सम्बन्धी ज्ञान का उपदेश होता है । वेद में अध्यात्म विद्या का पूरी तरह प्रतिपादन किया गया है । आत्मा जन्म धारण क्यों करता है ? वह विभिन्न योनियों में क्यों जाता है ? कैसे जाता है ? आत्मा की उन्नति कैसे होती है ? वह मुक्ति कैसे प्राप्त करता है ? मुक्ति की अवस्था में आत्मा की स्थिति कैसी होती है ? आत्मा का स्वरुप कैसा है ? उसके गुण , कर्म और स्वभाव कैसे है ? परमात्मा का स्वरुप कैसा है ? परमात्मा सृष्टि रचना क्यों करता है ? परमात्मा के स्वरुप के ज्ञान से ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है ; अन्य कोई उपाय नहीं है , आदि बातों का वेद में उपदेश किया गया है ।

आत्मा की उन्नति के लिए वेद में कई उपाय बतलाए गए हैं ।
आत्मा की उन्नति के लिए सरल हृदय से ईश्वर की स्तुति , प्रार्थना और उपासना करनी चाहिए ऐसा वेद में बतलाया गया है ।

मनुष्य धर्मं का पालन करे , धर्मं का पालन करते हुए धन कमाए , धर्म पूर्वक कमाए हुए धन से अपने जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करे , अपना मानव जीवन सफल बना सके , और इनके आधार पर ही मुक्ति पथ का पथिक बनकर मुक्ति की प्राप्ति कर सके , इसके लिए आवश्यक सभी ज्ञान -विज्ञान , विद्याओं आदि का पूरा -पूरा वर्णन वेद में किया गया है ।

वैदिक ज्ञान पूर्णतः तर्क संगत है । वेद में किसी विषय का तर्क संगत ज्ञान ही दिया गया है । जो तर्क के विरुद्ध हैं , ज्ञान -विज्ञान के विरुद्ध हैं , बुद्धि के विपरीत हैं , प्रकृति के नियमों के विपरीत हैं , ऐसी बातें , ऐसा वर्णन , ऐसा उपदेश वेद में नहीं है ।

वैदिक भाष्य और और वेद के मुख्य भाष्य

वैदिक भाष्य और वेद के मुख्य भाष्य

पुरातन काल में वेदों के अनेक भाष्य प्रचलित थे । परन्तु आज कोई प्राचीन भाष्य नहीं मिलता है । हाँ ! इधर मध्य काल के तीन भाष्य अवश्य मिलते हैं ---उव्वट का भाष्य , महीधर का भाष्य और सायण का भाष्य । परन्तु आधुनिक युग में नव जागरण के अग्रदूत महान पुरोधा महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती ने जब वेदों का भाष्य किया तब उव्वट , महीधर और सायण के वेद भाष्य स्वामी दयानंद के वेद भाष्य के सामने धूमिल पड़ गए ।

 उव्वट , महीधर और सायण के वेद भाष्य के रहते हुए भी महर्षि दयानंद को वेद भाष्य करने की आवश्यकता पड़ी । इन भाष्यकारों द्वारा किए गए भाष्यों में अनेक गलतियाँ हैं ।वे वैदिक मन्त्रों का गलत अर्थ करते हैं ।जिससे वेद की महत्ता बहुत घट जाती है और वे अश्लील ग्रन्थ बन जाते हैं ।उन में ज्ञान विज्ञान की बातें कम हो जाता है ।ऐसी परिस्थिति में वेद मन्त्रों के ठीक -ठीक अर्थ बतलाने के लिए , वेद की महत्ता स्थापित करने के लिए , वेद ज्ञान -विज्ञान के ग्रन्थ हैं यह प्रमाणित करने के लिए , वेद में किस्से कहानियां , अश्लील बातें आदि नहीं हैं यह प्रमाणित करने के लिए महर्षि दयानंद को वेद- भाष्य करने की आवश्यकता पड़ी । महर्षि दयानंद ने अपने वेद- भाष्य की भूमिका में स्पष्ट रूप से लिखा है--- यह भाष्य ऐसा होगा कि जिससे वेदार्थ से विरुद्ध अबके बने भाष्य और टीकाओं वेदों में भ्रम से जो मिथ्या दोषों के आरोप हुए हैं वे सब निवृत्त हो जाएंगे ।

महर्षि दयानंद ने वेदों का अध्ययन किया था ।वेदांग अर्थात शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , ज्योतिष और छंद का अध्ययन किया था ।अन्य वैदिक शास्त्रों का भी गहन अध्ययन किया था । वेद में निहित ज्ञान कीगहराई को समझा था ।यही महर्षि दयानंद की विशेषता थी ।

उव्वट , महीधर और सायण में ये विशेषताएँ नहीं थीं ।
उव्वट , महीधर और सायण वेदों के विद्वान नहीं थे। इसलिए उनका वेद-भाष्य अनेक गलतियों , भ्रमों एवं असंगतियों से भरपूर है ।उन्होंने वेद के गहन अध्ययन के बिना ही वेद -भाष्य किया है ।अतः वेद में बतलाए गए ज्ञान को भी आगे और पीछे की बातों में मेल न दिखा सके ।


वे पुराणों के विद्वान थे । अतः जो भी वेद मंत्र उनके सामने होता था उसमें वे पौराणिक गाथाओं को ढूंढा करते थे । उनके वेद-भाष्य का आधार पुराण और पुराणों की कहानियां थी ।वे शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , ज्योतिष ,और छंद के आधार पर वेद मन्त्रों का अर्थ नहीं कर सकते थे ।

महर्षि दयानंद ने वेद -भाष्य के लिए पुराण और पुराणों की कहानियों का सहारा नहीं लिया ।
महर्षि दयानंद के वेद -भाष्य की अनेक विशेषताएँ हैं ।उन्होंने शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , ज्योतिष और छंद के आधार पर वेदों का भाष्य किया है ।इनके वेद -भाष्य में किसी प्रकार का आतंरिक विरोध नहीं दिखाई देता है , पूर्वापर पूर्णतया सामंजस्य है । महर्षि दयानंद के वेद -भाष्य द्वारा स्पष्ट रूप से ईश्वर की मान्यता के सम्बन्ध में , देवताओं के सम्बन्ध में , कर्मफल , पुनर्जन्म और मोक्ष के सम्बन्ध में , कर्त्तव्याकर्त्तव्य के सम्बन्ध में , भक्ति और उपासना के सम्बन्ध में , ज्ञान -विज्ञान के सम्बन्ध में निश्चित ज्ञान प्राप्त होता है । आधुनिक युग के ज्ञान -विज्ञान की सभी शाखाओं -उपशाखाओं का वेद में प्रतिपादन है ,यह स्पष्ट हो जाता है ।इस भाष्य से वेदों का सच्चा ईश्वरीय ज्ञान प्रकट हो गया है , वेदों का सर्वोपरीमहत्व प्रमाणित हो गया है ।

महर्षि दयानंद ने ऋग्वेद के सातवें मंडल के चौथे अनुवाक , इकसठवें सूक्त के मंत्र संख्या दो तक और पूरे यजुर्वेद का भाष्य किया है ।

ईश्वर एक है ,निराकार है , जन्म -मृत्यु के बंधन में नहीं आता है , वह सत् ,चित्त और आनंद है , सर्वशक्तिमान है , सृष्टि का कर्ता ,पालकऔर उपसंहार कर्ता है , वही सारी सृष्टि का स्वामी है , सर्व सद्गुण सम्पन्न है , सभी दुर्गुणों से रहित है , वह कर्मफल का भोक्ता नहीं है , आदि -आदि ।


ऋषि दयानंद ने वेद भाष्य में बतलाया है की ---जिनमें दिव्य शक्तियां हों वे देवता है : देवता चेतन या जड़ दोनों प्रकार के हो सकते है। देव का अर्थ विद्वान भी होता है ।सभी प्रकार की दिव्य शक्तियां ईश्वर में पुर्णरूपेण हैं । अतः ईश्वर ही सबसे बड़ा देव है , महादेव है । इन्द्र , वरुण , अग्नि , वायु जहाँ जड़ दिव्य शक्तियों के नाम हैं वहीँ विषय भेद से ईश्वर के नाम भी हो सकते है । माता , पिता , गुरु आदि साक्षात् चेतन देवी देवता हैं ।


महर्षि दयानंद के वेद -भाष्य के अनुसार वेद में सारी सत्य विद्याएँ भरी हैं , ज्ञान - विज्ञान की सभी बातें वेद में हैं , या यों कहें कि ज्ञान -विज्ञान की सारी बातें वेद से ही निकली हैं ।


दयानंद के वेद -भाष्य के आधार पर--- कर्मफल का भोग अवश्य होता है ;कर्मफल का भोग कर्ता को ही होता है ; ईश्वर से क्षमा याचना , प्रार्थना अथवा भोग आदि चढ़ा कर कर्मफल के भोग से नहीं बचा जा सकता है ; एक के द्वारा किए गए शुभ या अशुभ कर्मों के फलदूसरे को अर्पण नहीं किए जा सकते ।

वेद का अर्थ है ज्ञान

वेद का अर्थ है ज्ञान


वेद शब्द संस्कृत भाषा के “विद्” धातु से बना है । “विद्” का अर्थ है: जानना, ज्ञान इत्यादि । ‘वेद’ हिन्दू धर्म के प्राचीन पवित्र ग्रंथों का नाम है, इससे वैदिक संस्कृति प्रचलित हुई । ऐसी मान्यता है कि इनके मन्त्रों को परमेश्वर ने प्राचीन ऋषियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था । इसलिए वेदों को श्रुति भी कहा जाता है । वेद प्राचीन भारत के वैदिक काल की वाचिक परम्परा की अनुपम कृति है जो पीढी दर पीढी पिछले चार-पाँच हज़ार वर्षों से चली आ रही है । वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं । वेद के असल मन्त्र भाग को संहिता कहते हैं ।
वेद शब्द का अर्थ है - ज्ञान।
वेद --मन्त्रों को ऋचा कहते हैं । अन्य ग्रंथों के मन्त्रों को ऋचा नहीं कहा जा सकता ।जो विद्वान किसी वेद मंत्र का नया अर्थ ढूंढ़ निकाले उसे ऋषि कहते हैं ।
प्रत्येक ऋचा के अनेक अर्थ हो सकते हैं। एक विद्वान एक ऋचा से किसी एक ज्ञान को प्राप्त करता है, उसका एक अर्थ निकालता है ।परन्तु एक दूसरा विद्वान जब उसी ऋचा को पढ़ता है तब उसे एक नए अर्थ , नए ज्ञान की प्राप्ति होती है ।अतः ये दोनों विद्वान ऋषि कहलाएंगे । उसी ऋचा का कोई तीसरा विद्वान एक अन्य नया अर्थ निकालता है नए ज्ञान को प्राप्त करता है तो उसे भी ऋषि कहा जाएगा। इस प्रकार एक ही ऋचा के अनेकों ऋषि हो सकते हैं । उन ऋषियों ने एक ही वेद मंत्र के अलग -अलग , नए - नए अर्थ निकाले हैं ।

एक ही ऋचा के भिन्न -भिन्न अनेक अर्थ हो सकते हैं । परन्तु उनका अर्थ परमात्मा के गुण- कर्म और स्वभाव के विपरीत नहीं होना चाहिए ।

प्रत्येक वेद- मंत्र का देवता भी होता है ।देवता कहते हैं उस वेद मंत्र में प्रतिपादित विषय को ।अर्थात उस मंत्र में किस विषय का ज्ञान दिया गया है ।

एक ऋचा के अनेक देवता हो सकते हैं ।
एक ही ऋचा के अर्थ जब भिन्न- भिन्न ऋषि करते हैं ,तब उनके अर्थों में भिन्नता आ जाती है ।अर्थ अलग -अलग होने से विषय भी अलग हो जाते हैं ।विषय की भिन्नता के कारण एक ही ऋचा के कई देवता हो सकते हैं ।

वेद उन ग्रंथों को कहते हैं जिनमें ज्ञान -विज्ञानं की सभी बातें बीज रूप में हैं ।
बीज रूप में कहने का अर्थ है---वेद में ज्ञान -विज्ञानं की सारी बातें बहुत कम शब्दों में कही गई है । अर्थात छोटे में कही गई है । बड़े - बड़े विद्वान वेद पढ़ कर उसमें निहित गूढ़ ज्ञान को समझ लेते हैं और अपने शिष्यों को समझते हैं ।
जैसे बीज में पूरा पेड़ समाया होता है ,जब बीज को मिटटी में बोया जाय , उसे पानी मिले , तब उससे अंकुर निकलता है और विशाल पेड़ बन जाता है। वैसे ही जब वेद मन्त्रों को ऋषियों की मस्तिष्क रुपी ऊर्वरा भूमि मिलती है , वे उन मन्त्रों पर विचार करते हैं तब उस वेद मंत्र में निहित ज्ञान को समझ लेते हैं और व्याख्या करते हैं । इस प्रकार शिष्यों को वेद का ज्ञान प्राप्त होता है ।

वेद चार हैं । उनके नाम हैं -----ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद ।

वेद का ज्ञान परमपिता परमेश्वर ने दिया है । परमेश्वर ने वेद का ज्ञान मानवी - सृष्टि के आदि काल में ही दिया ।
परमात्मा ने सृष्टि के आदि काल में स्वयं उत्पन्न चार ऋषियों को वेद का ज्ञान दिया । उन चार ऋषियों के नाम थे ---अग्नि , वायु , आदित्य और अंगिरा।ऋग्वेद का ज्ञान अग्नि ऋषि को , यजुर्वेद का ज्ञान वायु ऋषि को , सामवेद का ज्ञान आदित्य ऋषि को और अथर्ववेद का ज्ञान अंगिरा ऋषि को दिया गया ।
 निराकार ईश्वर ने ऋषियों को वेद का ज्ञान दिया ।
जैसे एक योगी अपना सन्देश दूर स्थित किसी दूसरे योगी के हृदय तक पहुंचा देता है उसी प्रकार परमयोगी परमात्मा ने वेद का ज्ञान उन चारों ऋषियों के हृदय में पहुंचा दिया ।
उन चारों ऋषियों ने वेद ज्ञान का उपदेश ब्रह्मा नाम के एक ऋषि को दिया । ब्रह्मा ने वेद का उपदेश अपने शिष्यों को दिया । उनके शिष्यों ने अपने शिष्यों को । इस प्रकार वेद का ज्ञान मानव समाज को गुरु - शिष्य परंपरा से प्राप्त होता रहा ।

उन चारों ऋषियों ने वेद को लिखा नहीं था ।
उनहोंने वैदिक ज्ञान का उपदेश ब्रह्मा के प्रति किया ।
ब्रह्मा ने सुनकर याद कर लिया ।
ब्रह्मा ने उसका उपदेश अपने शिष्यों के प्रति किया ।
शिष्यों ने सुनकर याद कर लिया और पुनः उन्होंने अपने शिष्यों को उसका उपदेश किया ।
इस प्रकार वेद का ज्ञान गुरु द्वारा शिष्य को सुनकर प्राप्त होता रहा । इसीलिए वेद को श्रुति भी कहते हैं ।

द्वापर युग के अन्तिम दिनों में वेद को लिपिबद्ध किया गया ।
वेद को ऋषिवर व्यास ने लिपिबद्ध किया ।
महर्षि व्यास ने देखा कि वेद के अध्ययन में अब लोग प्रमाद करने लगे हैं । लोगों में वेद पढ़ने की रूचि नहीं रह गई है ।
अतः कुछ समय पश्चात् वेद का ज्ञान लुप्त हो जाएगा ।
इसीलिए उन्होंने वेद को लिपिबद्ध किया ।
इस प्रकार वेद का ज्ञान सदा के लिए सुरक्षित हो गया ।
वेद व्यास को वेद के सारे मंत्र कंठस्थ नहीं थे ।
परन्तु जब उन्होंने वेदों का संकलन करने का निश्चय काया तब ऋषियों के पास जा -जा कर उन्होंने वेद मन्त्रों का संग्रह किया ।

परमात्मा ने मानव को इस धरती पर सुखपूर्वक जीवन निर्वाह कर सकने तथा मोक्ष प्राप्त कर सकने के लिए करुणा पूर्वक वेद का उपदेश दिया ।
मानव जीवन के लक्ष्य ---धर्मं , अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए परमात्मा ने वेद का उपदेश दिया ।


वेद मन्त्रों को पढ़कर उसे सभी व्यक्ति नहीं समझ सकते हैं ।
जिसने वेदांग , अर्थात शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , ज्योतिष और छंद का विधिवत अध्ययन किया हो वही वेद मन्त्रों के अर्थ समझ सकता है । वेद के विद्वान ऋषियों द्वारा वेद के भाष्य किए गए हैं ।उन्हें पढ़कर जन साधारण वैदिक शिक्षा से लाभ उठा सकता है ।

Thursday, January 2, 2014

मनुस्मृति वेद का सार है ।

मनुस्मृति वेद का सार है ।

स्वयंभू मनु पहले मनुष्य हैं। सारी धरती पर बसने वाले मनुष्य उसी एक पिता की सन्तान हैं। उस पिता को मनु कहा जाता है। मनुष्य शब्द में मनु जी का नाम समाहित है। उनका नाम न आए तो मनुष्य अपनी पहचान भी न जान पाए। अंग्रज़ी में मनुष्य को मैन कहा जाता है। इसमें भी मनु के नाम के 3 अक्षर मौजूद हैं। हिब्रू और अरबी में उन्हें आदम कहा जाता है और उनकी औलाद को बनी आदम कहा जाता है। आदम नाम की धातु ‘आद्य’ संस्कृत में आज भी पाई जाती है। वास्तव में स्वयंभू मनु और आदम एक ही शख्सियत के दो नाम हैं।

संस्कृत में मनुस्मृति के नाम से उनकी शिक्षाओं का एक संकलन भी मिलता है । उनकी शिक्षाओ के रचनाकाल अथवा उनकी शिक्षाओं के संकलन के रचनाकाल पर विचार करना ही इस आलेख का उद्देश्य है ।
स्वामी दयानन्द जी ने वेद की भांति मनुस्मृति को भी सृष्टि के आदि में हुआ माना है। सृष्टि के आदि विषय में स्वामी जी ने मनु को बताया है और मनुस्मृति को एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष पुराना माना है। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में मनुस्मृति के विषय में कहा है -

‘यह मनुस्मृति जो सृष्टि के आदि में हुई है’ (सत्यार्थप्रकाश,एकादशसमुल्लास,पृ.187)

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्ति., पृ.17 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा है -
‘यह जो वर्त्तमान सृष्टि है, इसमें सातवें (7) वैवस्त मनु का वर्त्तमान है, इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं। स्वायम्भव 1, स्वारोचिष 2, औत्तमि 3, तामस 4, रैवत 5, चाक्षुष 6, ये छः तो बीत गए हैं और सातवां वैवस्वत वर्त्त रहा है.’ (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्ति., पृ.17)


स्वामी जी ने बताया है कि एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युगियां होती हैं। एक चतुर्युग में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं। सतयुग में 1728000 वर्ष, त्रेता में 1296000 वर्ष, द्वापर में 864000 वर्ष और कलियुग में 432000 वर्ष होते हैं। इन चारों युगों में कुल 4320000 वर्ष होते हैं। 71 चतुर्युगियों में कुल 306720000 वर्ष होते हैं। छः मन्वन्तर अर्थात 1840320000 वर्ष पूरे बीत चुके हैं और अब सातवें मन्वन्तर की 28वीं चतुर्युगी चल रही है। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका लिखे जाते समय तक सातवें मन्वन्तर के भी 120532976 वर्ष बीत चुके थे। इस तरह स्वामी जी के अनुसार उस समय तक स्वयंभू मनु को हुए कुल 1960852976 वर्ष, एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष बीत चुके थे।

स्वामी जी ने यही काल स्वयंभू मनु का बताया है, और उस काल के स्वयंभू मनु को मनु स्मृति का स्मृतिकार बतलाया है । उसमें जो श्लोक मनु के नाम से कहे गए हैं, वास्तव में उन्हें गुरू - शिष्य परम्परा में श्रुति - वाचिक प्रक्रिया के अंतर्गत पीढ़ी दर पीढ़ी स्मरण कर्तेभुये संरक्षित किया जा रहा था , जिसे बाद में लिपिबद्ध कर लिया गया ।  मनु स्मृति का स्वयंभू मनु से ही संबंध है। हालाँकि स्वामी दयानंद जी ने मनु स्मृति को प्रक्षिप्त मानकर उसके कुछ श्लोकों को नहीं माना है । उन्होंने कहा है कि मनुस्मृति के कुछ श्लोक प्रक्षिप्त हैं और उनका कुछ पता नहीं है कि उन्हें कब और किसने लिखा है?

भारतवर्ष में वेदों के उपरान्त सर्वाधिक मान्यताप्राप्त ग्रंथों में  ‘मनुस्मृति’ का ही नाम आता है। मनु महाराज के मनुस्मृति में चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मानव मात्र के जीवन में घटित होने सम्भव हैं यह सब धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है।
महर्षि बाल्मीकि रचित रामायण और महर्षि वेदव्यास (कृष्णद्वेपायन ) रचित महाभारत में मनुस्मृति के श्लोक व् मनु महाराज कि प्रतिष्ठा अनेकों स्थानो पर आयी है किन्तु मनुस्मृति में रामायण , महाभारत व बाल्मीकि , व्यास जी का नाम तक नही । हाँ ! मनुस्मृति में मनु महाराज ने वेदों का जिक्र किया है और वेदों की महिमा का गान अनेक श्लोकों में किया है ।
वेद के सन्दर्भ में अनेक वचन मनु स्मृति में आये है बल्कि यह कहना उचित होगा मनुस्मृति वेद सार ही है । अतः वेद मनु से प्राचीन है -
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम ।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु : समलक्षणम् ॥ मनु १/१३
जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारो ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराये उस ब्रह्मा ने अग्नि , वायु, आदित्य और [तु अर्थात ] अंगिरा से ऋग , यजुः , साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया ।

वेदोSखिलो धर्ममूलम् ।  मनु २/६
वेद सम्पूर्ण धर्म (कानून Law) का मूल है ।

यः कश्चित्कस्यचिधर्मो मनुना परिकीर्तित : ।
स सर्वोSभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ मनु २/९
मनु ने जिस किसी को जो कुछ भी धर्म कहा है वह सब वेद के अनुकूल ही है , क्योकि वेद सर्वमान्य है ।

नास्तिको वेदनिंदकः ।  मनु २/११
वेद कि निंदा करने वाले नास्तिक (अनीश्वरवादी) है


मनुस्मृति में वेदों का सार है । मनुमृति को बिना समझें उसकी निंदा करने वाले और उसे जलाने वाले धर्मद्रोहियों के लिए मनुस्मृति का यह श्लोक पठनीय है -
निषेकादिश्मशानान्तो मंत्रैर्यस्योदितों विधि: |
तस्य शास्त्रेsधिकारोsस्मिन्यज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित | – मनुस्मृति
मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों का वर्णन, वेद के जिस प्रकरण में है उसी को मनुस्मृति में लिया गया है , हमने उसके अतिरिक्त अपनी ओर से आँय कुछ भी नहीं कहा है !

मनुस्मृति में श्लोक ११/६ के माध्यम से कहा गया है कि वेद ही सर्वोच्च और प्रथम प्राधिकृत है। वेद किसी भी प्रकार के ऊँच-नीच, जात-पात, महिला-पुरुष आदि के भेद को नहीं मानते।

इत्यादि अनेक वचन है जो वेद के सन्दर्भ में मनु में आये है बल्कि यह कहना उचित होगा मनुस्मृति वेद सार ही है । अतः वेद मनु से प्राचीन है इसमें लेशमात्र भी संदेह नही ।
वैदिक व भारतीय पुरातन ग्रंथों के जानकारों कहना है कि मनुस्मृति में जहाँ कहीं भी वेद विरुद्ध आचरण दिखे वो प्रक्षेप (मिलावट ) है अतः त्याज्य है ।

Wednesday, November 6, 2013

सम्पूर्ण धर्म का मूल वेद

                                सम्पूर्ण धर्म का मूल वेद

वेदों की महता के सन्दर्भ में विभिन्न पुरातन वैदिक विद्वानों ने अपने विचार अपने ग्रंथों में अंकन किया है । मनुस्मृति के स्मृतिकार मनु महाराज वेद के विषय में अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं -
वेदोSखिलो धर्ममूलं ..... - मनुस्मृति 2 -6
अर्थात् पूर्ण धर्म का मूल वेद में है।
धर्म्जिग्यसमानानाम् प्रमाणं परमं श्रुतिः ।  - मनुस्मृति 2 - 13
अर्थात् धर्म के जिज्ञासुओं के लिए श्रुतिः (वेद) प्रमाण हैं।
मनु महाराज आगे कहते हैं -
पित्रिदेवमनुष्याणाम् वेदश्चक्षु: सनातनम् ।
अशक्यं चाSप्रमेय च वेद्शास्त्र्मिति स्थितिः ।। -
                              मनुस्मृति 12 -94
पितरों , देवों और मनुष्यों के लिए अनादि वेद नेत्र के समान हैं।
वेदों के सन्दर्भ में वृहदारण्यक उपनिषद् में भी अंकित है -
अरेSअस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद् यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोSथर्वान्गिरस । - वृहदारण्यक उपनिषद् 4 - 5 - 11
ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद परमात्मा के जी श्वास मात्र हैं ।
महाभारतकार कृष्णद्वैपायन वेदव्यास कहते हैं -
अनादिनिधना विद्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ।
    - महाभारत शांतिपर्व 233 - 24
अर्थात् आदि , अन्तरहित नित्य वाणी को परमात्मा ने प्रकट किया ।
वेदों के महान विद्वान् यास्काचार्य वेदों के विषय में कहते हैं -
स्थानुरण्यं भारहार : किलाभूदधीत्य वेदं न विजनाति योसSअर्थज्ञ इत्सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानबिधूतपाप्मा ।।
           - निरूक्त 1 -18
अर्थात् जो वेद को पढता है , बिना अर्थ जाने , वह (मनुष्य नहीं) भार उठाने वाला खम्भा होता है । (और) जो अर्थ को जानता है,(वह) सपूर्ण कल्याण को प्राप्त करता है।
महर्षि दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में कहा है कि जिस व्यापक अविनाशी सर्वोत्कृष्ट परमेश्वर में सब ब्रह्माण्ड और पृथ्वी आदि सब लोक स्थित हैं और जिसको सब वेद वर्णन करते हैं , उसको न जान कर , वेद पढने से भी कुछ नहीं होगा।
प्राचीन वैदिक ज्ञानियों ने वेदार्थ समझने और उसके अनुसार व्यवहार करने की महता के सन्दर्भ में वास्तविक ज्ञान का वैदिक ग्रन्थों में बृहत् वर्णन किया है , परन्तु मध्यकालीन वेद के भाष्यकारों ने अज्ञानवश अथवा जान - बुझकर वेद के ऐसे भाष्य किये जिससे वेदों के सन्दर्भ में मिथ्या धारणाओं को बल मिला।

Thursday, September 19, 2013

वैदिक ग्रंथों के अनुसार वर्षा का कारण सूर्य और वायु

वैदिक ग्रंथों के अनुसार वर्षा का कारण सूर्य और वायु

आधुनिक विज्ञान के अनुसार वर्षा का मुख्य कारण वायु है, वायु के प्रवाहित होने के कारण मेघ बनते हैं और मेघ वर्षा करते हैं । वायु सूर्य की किरणों के प्रभाव से
मेघ बन जाती है । सूर्य की किरणें वाष्पन विधि से जल व वायु का मिलाप करा देती हैं और फिर बादल बन जाते हैं ।
हमारे आदिग्रंथ वेद में परमात्मा के द्वारा उपर्युक्त बातें सहस्त्राब्दियों पूर्व ही , जब सृष्टि रचना हुई, उद्घाटित की गई हैं। ऋग्वेद 1/6/4 में अन्न की उत्पति हेतु वायु के द्वारा बार - बार मेघ का रूप धारण कर लेने का वर्णन अंकित है । ऋग्वेद 1/6/4 में कहा गया है -

आदह स्वधामनु पुनर्गर्भत्वमेरिरे । दधाना नाम यज्ञियम् ।। ऋग्वेद 1/6/4
अर्थात - यज्ञीय नाम वाले , धारण करने में समर्थ मरूत् वास्तव में अन्न की कामना से बार-बार मेघ रूपी गर्भ धारण करते हैं ।
अर्थात् अन्न की उत्पत्ति हेतु ही वायु बार-बार मेघ का रूप धारण कर लेती है । मेघ बनकर जब वह बरसती है तो फसलें तैयार होती हैं ।।
इसी प्रकार ऋग्वेद 1/22/6 कहा है कि -

अपां नपातमवसे सवितारमुप स्तुहि । तस्य व्रतान्युश्मसि । । ऋग्वेद 1/22/6
अर्थ - हे ऋत्विज । आप हमारी रक्षा के लिये सविता देवता की स्तुति करें । हम उनके लिये सोमयागादि कर्म सम्पन्न करना चाहते हैं । वे सवितादेव जलों को सुखाकर पुन: सहस्रों गुना बरसाने वाले हैं ।
इस मन्त्र में सविता (सूर्य) देवता द्वारा जलों को सुखाकर पुन: सहस्रों गुना बरसाने की बात कही गयी है । इसमें तो सम्भवत: मुझे अपनी ओर से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं ही है ।
यह सर्वविदित है कि सूर्य का वर्षा में क्या योग है ।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जो त्थ्य आज वैज्ञानिक प्रमाणित करते हैं वो तो स्वयं वेद भगवान सहस्त्राब्दियों पूर्व आदि काल में ही प्रमाणित कर चुके हैं । वेदों की सत्ता परम है और आज तक मात्र अपनी इन्ही भगवत्ता के कारण ही वेद अखण्ड बने हैं और अखण्ड ही बने हुए रहेंगे।

Wednesday, September 18, 2013

हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी देवता है

हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी देवता है

आर्य सनातन वैदिक धर्मावलम्बी हिन्दुओं के विरोधी , हिन्दुत्व विद्वेषी , विदेशी , विधर्मियों ने आर्य सभ्यता - संस्कृति , साहित्य - भाषा ,हिन्दू देवी - देवताओं का उपहास कर अपनी संस्कृति की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए भारतीय पुरातन ग्रंथों में छेड़ - छाड़ के साथ ही अनेक प्रकार की विभ्रांति फ़ैलाने का प्रयास किया है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार तैंतीस कोटि अर्थात तैंतीस प्रकार के वैदिक देवता सर्वसिद्ध हैं , परन्तु वेद और आर्य सनातन विरोधियों ने कोटि का अर्थ करोड़ बतलाकर हिन्दुओं में तैंतीस करोड़ देवी - देवता होने का असत्य प्रचार किया। परिणामस्वरूप आम जन में यह विभ्रांति घर कर गई है कि हिन्दुओं में तैंतीस करोड़ देवी - देवता में श्रेष्ठ , पूजनीय और श्रेष्ठ उपास्य कौन है ? 
तैंतीस कोटि देवी - देवता के सम्बन्ध में वैदिक विश्लेषण -

देवता शब्द का वास्तविक अर्थ

देवो दानाद्वा, दीपनाद्वा  घोतनाद्वा, घुस्थानो भवतीति व । ।     : निरुक्त अ०  ७ । खं०  १५

अर्थात दान देने से देव नाम पड़ता है ।  और दान कहते है  अपनी चीज दूसरे के अर्थ दे देना ।
दीपन कहते है प्रकाश करने को, धोतन कहते है सत्योपदेश को, इनमे से दान का दाता मुख्य एक ईश्वर ही है कि जिसने जगत को सब पदार्थ दे रखे है , तथा विद्वान मनुष्य भी विधादि पदार्थों के देने वाले होने से देव कहलाते है ।
दीपन अर्थात सब मूर्तिमान द्रव्यों का प्रकाश करने से सुर्यादि लोको का नाम भी देव है ।
देव शब्द में 'तल्' प्रत्यय करने से देवता शब्द सिद्ध होता है ।

नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्शत्   : यजुर्वेद अ०  ४० । मं०  ४

इस वचन में देव शब्द से इन्द्रियों का ग्रहण होता है । जोकि श्रोत्र , त्वचा , नेत्र , जीभ , नाक और मन , ये छ : देव कहाते है । क्योकि शब्द , स्पर्श, रूप, रस, गंध , सत्य तथा असत्य आदि अर्थों का इनके प्रकाश होता है अर्थात इन्ही ६  इन्द्रियों से हमें उपरोक्त ६ लक्षणों (शब्द , स्पर्श, रूप .....) का ज्ञान होता है ।
देव कहने का अभिप्राय ये नही की श्रोत्र , त्वचा , नेत्र ... आदि पूजनीय हो गये .

मातृदेवो भव , पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव अतिथिदेवो भव  । प्रपा ० । अनु ० ११

माता पिता , आचार्य और अतिथि भी पालन , विद्या  और सत्योपदेशादि के करने से देव कहाते है वैसे ही सूर्यादि लोकों का भी जो प्रकाश करने वाला है , सो ही ईश्वर सब मनुष्यों को उपासना करने के योग्य इष्टदेव है , अन्य  कोई नही ।  इसमें कठोपनिषद का भी प्रमाण है :

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विधुतो भान्ति कुतोSयमग्नि : ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति । ।
-कठ ० वल्ली ५ । मं ० १५

सूर्य , चन्द्रमा , तारे , बिजली और अग्नि ये सब परमेश्वर में प्रकाश नही कर सकते , किन्तु इन सबका प्रकाश  करने वाला एक वही है क्योकि परमेश्वर के प्रकाश से ही सूर्य आदि सब जगत प्रकाशित हो रहा है । इसमें यह जानना चाहिए कि ईश्वर से भिन्न कोई पदार्थ स्वतंत्र प्रकाश करने वाला नही है, इससे एक परमेश्वर ही मुख्य देव है ।

अब ३३ देवता (न कि करोड़) के विषय में देखा जाये -

ये त्रिंशति त्रयस्परो देवासो बर्हिरासदन् | विदन्नह द्वितासनन् ||
ऋग्वेद अ ० ६ । अ ० २ । व० ३५ । मं ० १

त्रयस्त्रिं;शतास्तुवत भूतान्यशाम्यन् प्रजापति : परमेष्ठय्द्हिपतिरासीत्   ||
यजुर्वेद अ०  १४   मं०  ३१

त्रयस्त्रिं;शत् अर्थात व्यवहार के ये तैंतीस (33) देवता है :
8 (आठ) वसु ,
11 (ग्यारह) रूद्र ,
12 (बारह) आदित्य ,
1 (एक) इन्द्र ओर
1 (एक) प्रजापति |

उनमें से 8 वसु ये हैं - अग्नि , पृथिवि , वायु , अन्तरिक्ष , आदित्य , घौ: , चन्द्रमा ओर नक्षत्र |
इनके नाम वसु इसलिये है कि सब पदार्थ इन्ही में वास करते है और ये ही सबके निवास करने के स्थान है ।

११ रूद्र ये कहलाते हैं - जो शरीर में दश प्राण है अर्थात प्राण, अपान , व्यान , समान , उदान , नाग , कुर्म , कृकल , देवदत्त, धनज्जय और १ १ वां  जीवात्मा । क्योंकि जब वे इस शरीर से निकल जाते है तब मरण होने से उसके सब सम्बन्धी लोग रोते है ।  वे निकलते हुए उनको रुलाते है , इससे इनका नाम रूद्र है ।

इसी प्रकार आदित्य 1२ महीनो को कहते है, क्योकि वे सब जगत के पदार्थों का आदान अर्थात सबकी आयु को ग्रहण करते चले जाते है , इसी से इनका नाम आदित्य है ।

ऐसे ही इंद्र नाम बिजली का है , क्योकि वह उत्तम ऐश्वर्य की विधा का मुख्य हेतु है और यज्ञ को प्रजापति इसलिए कहते है की उससे वायु और वृष्टिजल की शुद्धि द्वारा प्रजा का पालन होता है । तथा पशुओं की यज्ञसंज्ञा होने का यह कारण है कि उनसे भी प्रजा का जीवन होता है ।  ये सब मिलके अपने दिव्यगुणों से ३ ३ देव कहाते है ।

इनमे से कोई भी उपासना के योग्य नही है, किन्तु व्यवहार मात्र की सिद्धि के लिए ये सब देव है, और सब मनुष्यों के उपासना के योग्य तो देव एक ब्रह्म ही है । 

स ब्रह्मा स विष्णु : स रुद्रस्य शिवस्सोअक्षरस्स परम: स्वरातट । -केवल्य उपनिषत खंड १ । मंत्र ८

सब जगत के बनाने से ब्रह्मा , सर्वत्र व्यापक होने से विष्णु , दुष्टों को दण्ड देके रुलाने से रूद्र , मंगलमय और सबका कल्याणकर्ता होने से शिव है ।

।। श्री शुकदेव चालीसा ।। रचनाकार- अशोक "प्रवृद्ध"

                                                      ।। श्री शुकदेव चालीसा ।।                                              रचनाकार- अशोक ...