Wednesday, April 15, 2026

।। श्री शुकदेव चालीसा ।। रचनाकार- अशोक "प्रवृद्ध"

                                                     ।। श्री शुकदेव चालीसा ।।

                                             रचनाकार- अशोक "प्रवृद्ध"

 

॥ दोहा ॥
श्री गुरु पद रज शीश धर, सुमिरि देव गणेश।
शुकदेव मुनि गुण गावहीं, हरहु सकल कलेश ।।
व्यास पुत्र वैराग्य निधि, ज्ञान पुंज अवतार।
अशोक प्रवृद्धमति अनुसार, गावत महिमा सार ।।

।। चौपाई ।।
जय शुकदेव मुनि विज्ञाानी। जय जय जय वैराग्य की खानी ।।
व्यास देव के सुत कहलाए। जग में ज्ञान की ज्योति जलाए ।।
शिव मुख अमर कथा तुम सुनी। अमर भये तुम ज्ञानी मुनी ।।
पार्वती जब निद्रा पाई। शुक ने तब हुंकार भरई ।।
क्रोधित शिव त्रिशूल उठायो। शुक उड़ व्यास भवन में आयो ।।
मुख मारग से गर्भ पधारे। बारह वर्ष वास विस्तारे ।।
माया भय से बाहर न आए। पिता वचन भी काम न आए ।।
तब श्रीकृष्ण स्वयं वहां आए। अभय दान दे मुनि मनाए ।।
जन्म लेत ही वन को धाये। मोह जगत के सब बिसराये ।।
नग्न स्वरूप दिगम्बर धारी। समदृष्टि मुनि मंगलकारी ।।
पीछे व्यास पुत्र कह धाए। वृक्षों ने तब उत्तर गाए ।।
कण-कण में है रूप तुम्हारा। ब्रह्म भाव जग बीच उजारा ।।
सरोवर तट अप्सरा नहाई। मुनि देख मन न सकुचाई ।।
वृद्ध व्यास जब पीछे आए। तिय सब वसन अंग लिपटाए ।।
मुनि निर्विकार ब्रह्म समाना। जग ने अद्भुत गौरव जाना ।।
पिता आज्ञा से मिथिला आए। जनक द्वार पर शीश नवाए ।।
द्वारे खडे प्रतीक्षा कीन्ही। विचलित भाव न चित में लीन्ही ।।
राज भोग में मन नहिं डोला। सत्य वचन मुख से मुनि बोला ।।
तेल पात्र ले नगरी घूमे। ध्यान न भटका पांव न झूमे ।।
बूंद न गिरी पात्र से नीचे। ध्यान अग्नि से तृष्णा सींचे ।।
जनक विदेह भये तब ज्ञानी। दीन्ही शिक्षा मधुर बखानी ।।
विदेह मुक्ति का मार्ग दिखाया। संशय सब मन का मिटवाया ।।
शुकताल की महिमा भारी। जहां बिराजे मुनि उपकारी ।।
अक्षय वट की छाया पावन। कथा कही मिटावन अज्ञान ।।
परीक्षित जब शापित भये। मृत्यु निकट लख व्याकुल भये ।।
गंगा तट मुनि आसन कीन्हा। भागवत अमृत सब को दीन्हा ।।
सात दिवस की कथा सुनाई। काल फांस से मुक्ति दिलाई ।।
तक्षक डसा न देह को जाना। आत्मा अमर सत्य पहचाना ।।
अद्वैत स्थिति तुम्हारी न्यारी। पूजत सुर मुनि और नर-नारी ।।
योगेश्वर तुम परम प्रतापी। हरते संकट भव दुख पापी ।।
शांत चित्त अरु सौम्य शरीरा। हरहु भक्त की सकल पीरा ।।
मुख मंडल पर ब्रह्म का तेजा। प्रभु ने निज दूत कर भेजा ।।
नारद मुनि भी तुमको ध्यावें। सनकादिक गुण कीर्ति गावें ।।
भक्ति सूत्र के तुम हो ज्ञाता। मोक्ष मार्ग के भाग्य विधाता ।।
ब्रह्म सूत्र का भाष्य तुम्हारा। भागवत है रूप तुम्हारा ।।
जो जन तुमको शीश झुकावै। सो वांछित फल निश्चय पावै ।।
काम क्रोध मद लोभ विनाशन। हृदय कमल पर तुम्हारा आसन ।।
कलि काल के तुम ही त्राता। शरणागत के सुख के दाता ।।
अशोक “प्रवृद्ध” विनय सुनावै। चरण कमल में प्रीति बढ़ावै ।।
शुक मुनि कृपा कीजे अब भारी। जय जय जय शुकदेव बिहारी ।।

।। दोहा ।।
शुकदेव मुनि की कृपा से, मिटे सकल अज्ञान।
हृदय बसें श्री राधिका, और कृष्ण भगवान ।।
चालीसा यह प्रेम से, पाठ करे जो कोय।
शुकदेव मुनि की दया से, बेड़ा पार ही होय ।।

।। श्री शुकदेव चालीसा ।। रचनाकार- अशोक "प्रवृद्ध"

                                                      ।। श्री शुकदेव चालीसा ।।                                              रचनाकार- अशोक ...