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Tuesday, January 14, 2014

आर्य , आर्यत्व और आर्यावर्त

आर्य , आर्यत्व और आर्यावर्त


आर्यावर्त हमारे देश का सर्वाधिक पुरातन नाम है और हमारी जाति का वास्तविक नाम आर्य है । जब मनुष्य जाति की उत्पति हुई , तभी से हमारी जाति का नाम आर्य पड़ा है ।हमारी जाति का सबसे पुराना नाम आर्य ही है ।अन्य नाम बाद में दिए गए हैं ।

 हमारी जाति का वास्तविक नाम आर्य ही है इसके एक नहीं अनेक प्रमाण है । हमारी जाति का मूल स्थान भारत ही है। भारत का सबसे पुराना नाम आर्यावर्त है । मनुस्मृति में कहा गया है -
आसमुद्रात्तु वै पुर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्।
 तयोरेवान्तरम् गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः ॥
- मनुस्मृति - २/२२
अर्थात् - पुर्वीय समुद्र से लेकर पश्चिम समुद्र तक दोनों पर्वतों ( हिमालय और विन्ध्य ) के बीचवाले देशों को विद्वान लोग आर्यावर्त कहते है । उन दिनों विन्ध्य पर्वत के दक्षिण का भाग समुद्र में डूबा था या जन शुन्य था इसलिए आर्यावर्त की सीमा पूर्व में समुद्र तक , दक्षिण में विन्ध्य पर्वत तक , पश्चिम में समुद्र तक और उत्तर में हिमालय पर्वत तक बतलाई गई है ।आर्यावर्त अर्थात् आर्य जाति के रहने वाले देश - प्रदेश ।अतः मनुस्मृति से यही प्रमाणित होता है कि हमारी जाति का सब से पुराना नाम आर्य ही है।
एक और प्रमाण - हमारी संस्कृति की यह परंपरा रही है की हम किसी कार्य को करने के पहले उसका संकल्प लें ।अतः कोई भी पूजा पाठ आरम्भ करते समय सबसे पहले पुरोहित हम से संकल्प बुलवाते हैं । उस संकल्प में आता है - जम्बूद्वीपे भारतवर्षे - भरतखंडे आर्यावर्तांतरगत ब्रह्मावर्तैक देशे ... आदि। यहाँ भी भारत वर्ष को आर्यावर्त कहा गया है अर्थात् आर्य जाति के रहने का स्थान है।

आर्य शब्द का अर्थ हैं - श्रेष्ठ ।
आर्य शब्द का अर्थ है अच्छे गुणों , विचारों का धारण करनेवाला । आर्य शब्द का अर्थ है वैर भाव को नहीं बढ़ानेवाला , आर्य शब्द का अर्थ है अन्याय नहीं करनेवाला , आर्य शब्द का अर्थ है अन्याय नहीं सहनेवाला , आर्य शब्द का अर्थ है सद् भावना को धारण करनेवाला , आर्य शब्द का अर्थ है अपने कर्त्तव्य कर्म को दृढ़तापूर्वक पालन करनेवाला ।

महाभारत में महात्मा विदुर ने कहा है -
न वैरमुद्दीपयती प्रशान्तं न दर्पमारोहति नास्तमेति ।
न दुर्गतो स्मीति करोत्यकार्यं तमार्यशीलं परमाहुरार्या:॥

ऊपर बताए गुण हमारी जाति में आरम्भ से ही थे । साथ ही मनुष्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए ये गुण आवश्यक हैं । अतः ये गुण हमारी जाति में आवश्यक रूप से होने ही चाहिए । ये गुण हमारी संस्कृति की पहचान हैं । इसीलिए हमारी जाति का नाम आर्य ही है ।

वेद में भी आर्य शब्द है। वेद में आर्य शब्द कई बार आया है । और वहाँ आर्य शब्द का प्रयोग ऊपर बताए गए अर्थों में ही हुआ है ।
ऋग्वेद में कहा है -
अहन भूमिददामार्यायाहं वृष्टिं दाशुषे मर्त्याम् ।
अहमपो अनयं वावशाना मम देवासो अनु केतामायन् ॥
ऋग्वेद  ४/२६/२
अर्थात् ( ईश्वर कहते हैं ) मैं आर्य के लिए भूमि देता हूँ । मैं दानशील मनुष्य के लिए धन की वर्षा करता हूँ । मैं घनघोर शब्द करनेवाले बादलों को धरती पर वर्षाता हूँ । विद्वानलोग मेरे ज्ञान ( उपदेश )के अनुसार चलते हैं ।
इस वेद मन्त्र में बतलाया गया है कि ईश्वर आर्य के लिए ही अर्थत अच्छे उत्तम मनुष्यों के लिए ही भूमि और धन देता है ।वर्षा करता है और ज्ञान देता है ।
ऋग्वेद में कहा है -
इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ।
अपघ्नन्तो अराव्ण: ॥
ऋग्वेद ९/६३/५
अर्थात् - आत्मा को बढ़ाते हुए दिव्य गुणों से अलंकृत करते हुए तत्परता के साथ कार्य करते हुए अदानशीलता को , ईर्ष्या , द्वेष , द्रोह की भावनाओं को , शत्रुओं को परे हटते हुए सम्पूर्ण विश्व को , समस्त संसार को आर्य बनाएं ॥

श्रीमद्भगवद्गीता में आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है।
भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन से कहा है -
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकिर्तिकरमर्जुन ।।
श्री मद्भग्वद गीता २/२
अर्थात् - हे अर्जुन ! तुम को विषम स्थल में यह अज्ञान किस हेतु से प्राप्त हुआ है , क्यों कि यह न तो आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुषों का प्रिय व उन द्बारा अपनाया गया है ।न स्वर्ग देनेवाला है और न कीर्ति को करनेवाला है ।
यह सभी जानते हैं की अर्जुन मोह में पड़कर अपना कर्तव्य - कर्म भूल चुका था और भिक्षा का अन्न खाने के लिए तैयार था । अपने धर्म को छोड़कर निन्दित कर्म करने के लिए तैयार था ।इसीलिए भगवान श्री कृष्ण ने उसे अनार्य कहा है ।और आर्यों के गुण अपनाने के लिए ही उसे पूरे गीता का उपदेश दिया है।भगवान श्री कृष्ण आर्य थे - अर्जुन आर्य था ।जब अर्जुन आर्य के कर्तव्य कर्म को छोड़कर अनार्य की तरह कर्म करने के लिए तैयार हुआ तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को धिक्कारा और आर्य बने रहने के लिए उअपदेश दिया ।
अतः जो श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करते हैं वे आर्य हैं , नहीं तो अनार्य हैं ।

 रामायण में भी आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है ।
वाल्मीकीय रामायण में आर्य शब्द का अनेक बार प्रयोग हुआ है ।
भगवान राम के गुणों का वर्णन करने के पश्चात वाल्मीकि मुनि से नारद जी कहते हैं --
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रिय दर्शनः ॥ १/१६
वे आर्य एवं सब में समान भाव रखनेवाले हैं । उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है ।
एक मनुष्य में जितने अच्छे गुण होने चाहिए उन गुणों का वर्णन भगवान श्री राम में करने के पश्चात नारद जी उन्हें आर्य कहते हैं ।

अन्य अनेक ग्रन्थों में भी आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है ।
अन्य ग्रन्थों में भी आर्य शब्द का प्रयोग इन्हीं अर्थों में हुआ है ।
निरुक्त में कहा गया है -
आर्याः ईश्वर पुत्राः ॥
अर्थात् - आर्य ईश्वर के पुत्र हैं ।

आधुनिक विद्वान आर्य शब्द का प्रयोग इन्हीं अर्थों में करते हैं । भारत के मूल निवासी जितने भी हैं वे आर्य हैं ।
महाकवि मैथिलिशरण गुप्त ने भारत - भारती में लिखा है -
जग जान ले कि न आर्य केवल नाम के ही आर्य हैं ।
वे नाम के अनुरूप ही करते सदा शुभ कार्य हैं ॥
यहाँ महाकवि मैथिलिशरण गुप्त ने स्पष्ट रूप में भारतवंशी सनातन धर्मावलंबी मात्र को आर्य कहा है और उन्हें शुभ कार्य करनेवाला बतलाया है। भारत वर्ष के मूल निवासी मात्र को महाकवि मैथिलिशरण गुप्त आर्य मानते थे - तभी तो उन्होंने लिखा है -
मानस - भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती -
भगवान ! भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती ॥
महाकवि रविन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा है -
हेथाय आर्य हेथा अनार्य हेथाय द्राविड़ चीन ।
शक - हूण - दल , पाठान - मोगल एक देहे हलो लीन ॥
अर्थात - यहाँ आर्य हैं , अनार्य , द्राविड़ और चीन वंश के लोग भी हैं । शक , हूण, पठान और मोगल न जाने कितनी जातियों के लोग आए और सभी एक ही देह में लीन हो गए ।
भारत में आर्य जाति थी । अन्य जातियाँ आईं और उसी में विलीन हो गईं ।

Saturday, January 11, 2014

मनुस्मृति के अनुसार भ्रष्ट राज्यकर्मियों की संपत्ति जब्त की जानी चाहिये - अशोक "प्रवृद्ध"

मनुस्मृति के अनुसार भ्रष्ट राज्यकर्मियों की संपत्ति जब्त की जानी चाहिये
अशोक "प्रवृद्ध"

                       यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हमारे देश में राजकीय क्षेत्र में भ्रष्टाचार अत्यंत गहरे स्तर तक व्याप्त हो चूका है । पुरातन भारतीय  ग्रंथों के अनुसार जिन लोगों के पास राज्यकर्म करने का अधिकार अर्थात जिम्मा होता है उनमें भी सामान्य मनुष्यों की तरह अधिक धन कमाने की प्रवृत्ति होती है और राजकीय अधिकार प्राप्त होने से वे उसका गलत इस्तेमाल करने लगते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक है परन्तु राज्य प्रमुख को इसके प्रति सजग रहना चाहिये।  राज्य के राजा अर्थात राज्य प्रमुख (आज के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री गण) का यह कर्तव्य है कि वह अपने कर्मचारियों की गुप्त जांच कराता रहे और उनको दंड देने के साथ ही अन्य कर्मचारियों को अपना काम ईमानदारी से काम करने के लिये प्रेरित करे। भारतीय पुरातन ग्रंथों में भ्रष्ट राज्यकर्मियों और भ्रष्ट राज्यकर्मियों के दंड , यहाँ तक कि भ्रष्ट राज्यकर्मियों
की संपत्ति जब्त करने और दण्डित किये जाने के सम्बन्ध में विस्तृत विवरण अंकित मिलते हैं । संसार के प्रथम स्मृति अर्थात संहिता ( कानून ) ग्रन्थ मनुस्मृति में स्मृतिकार मनु महाराज कहते हैं -

राज्ञो हि रक्षाधिकृताः परस्वादायिनः शठाः।
भृत्याः भवन्ति प्रायेण तेभ्योरक्षेदिमाः प्रजाः।।
                      - मनुस्मृति 7.124
 
अर्थात -प्रजा के लिये राज्य कर्मचारी अधिकतर अपने वेतन के अलावा भी कमाई क्रने के इच्छुक रहते हैं अर्थात उनमें दूसरे का माल हड़पने की प्रवृत्ति होती है। ऐसे राज्य कर्मचारियों से प्रजा की रक्षा के लिये राज्य प्रमुख को तत्पर रहना चाहिये।

ये कार्यिकेभ्योऽर्थमेव गृह्यीयु: पापचेतसः।
तेषां सर्वस्वामदाय राजा कुर्यात्प्रवासनम्।।
- मनुस्मृति 7.125
                        अर्थात -प्रजा से किसी कार्य के लिये अनाधिकार धन लेने वाले राज्य कर्मचारियों को घर से निकाल देना चाहिये।  उनकी सारी संपत्ति छीनकर उन्हें देश से निकाल देना चाहिये।

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के षष्ठम् समुल्लास में मनुस्मृति के श्लोक के आधार पर भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर प्रधानमंत्री और न्यायाधीश तक को दण्डित किये जाने के सम्बन्ध में लिखा है -

कार्षापणं भवेदण्डयो यत्रान्य: प्राकृतो जन:|
तत्र राजा भवेदण्डय: सहस्त्रमिति धारणा|| मनुस्मृति८.३३६ ||

साधारण जनता से राजा को सहस्त्र गुणा दण्ड होना चाहिये, (जिस अपराध में साधारण प्रजा को एक जूता मारा जाये उसी अपराध मे‍ राजा को एक हजार जूते मारने का दण्ड देना चाहिये|

प्रश्न : जो राजा वा रानी अथवा न्यायाधीश वा उसके परिवार का को‍ई भी सदस्य व्यभिचारादि कुकर्म करे
तो उसको कौन दण्ड देवे ?

उत्तर : सभा, अर्थात उसको तो प्रजापुरुषों से भी अधिक दण्ड होना चाहिये|

जो राजा दण्ड देने योग्य को छोड़ देता और जिसको दण्ड देना न चाहिये, उसको दण्ड देता है
वह जीता हुआ बड़ी निन्दा को और मरे पीछे बड़े दु:ख को प्राप्त होता है इसलिये अपराधी को
दण्ड मिले, अनपराधी को दण्ड कभी न देवे|

अदब्डयान्दण्डयन् राजा दण्डयांश्चैवाप्यदण्डयन् |
अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति || मनुस्मृति ||८|१२८ ||

निष्कर्ष यह है कि आज लोकतन्त्र की हत्या करके सरकार ने निरपराध साधु - संतों और अन्यान्य निरपराध लोगों को बिना किसी अपराध के बरबर्तापूर्ण कुक्रत्वय किया है यह क्षमा करने के योग्य नहीं है इसका उन्हें दण्ड भुगतने के किये तैयार रहना होगा परमेश्वर न्यायकारी है|

                      पुरातन भारतीय ग्रन्थ अर्थात भारतीय अध्यात्मिक दर्शन राजस कर्म की मर्यादा और शक्ति बखान करता है।  मनुष्य स्वयं सात्विक भले हो पर अगर उसके जिम्मे राजस कर्म है तो वह उसे भी दृढ़ता पूर्व निभाये यही बात भारतीय पुरातन अध्यात्मिक दर्शन कहता है।  हमारे पुरातन भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को शायद इसलिये ही शैक्षणिक पाठ्यक्रम से दूर रखा गया है क्योंकि उसके अपराधियों के साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी कड़े दंड का प्रावधान किया गया।

Thursday, January 2, 2014

मनुस्मृति वेद का सार है ।

मनुस्मृति वेद का सार है ।

स्वयंभू मनु पहले मनुष्य हैं। सारी धरती पर बसने वाले मनुष्य उसी एक पिता की सन्तान हैं। उस पिता को मनु कहा जाता है। मनुष्य शब्द में मनु जी का नाम समाहित है। उनका नाम न आए तो मनुष्य अपनी पहचान भी न जान पाए। अंग्रज़ी में मनुष्य को मैन कहा जाता है। इसमें भी मनु के नाम के 3 अक्षर मौजूद हैं। हिब्रू और अरबी में उन्हें आदम कहा जाता है और उनकी औलाद को बनी आदम कहा जाता है। आदम नाम की धातु ‘आद्य’ संस्कृत में आज भी पाई जाती है। वास्तव में स्वयंभू मनु और आदम एक ही शख्सियत के दो नाम हैं।

संस्कृत में मनुस्मृति के नाम से उनकी शिक्षाओं का एक संकलन भी मिलता है । उनकी शिक्षाओ के रचनाकाल अथवा उनकी शिक्षाओं के संकलन के रचनाकाल पर विचार करना ही इस आलेख का उद्देश्य है ।
स्वामी दयानन्द जी ने वेद की भांति मनुस्मृति को भी सृष्टि के आदि में हुआ माना है। सृष्टि के आदि विषय में स्वामी जी ने मनु को बताया है और मनुस्मृति को एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष पुराना माना है। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में मनुस्मृति के विषय में कहा है -

‘यह मनुस्मृति जो सृष्टि के आदि में हुई है’ (सत्यार्थप्रकाश,एकादशसमुल्लास,पृ.187)

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्ति., पृ.17 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने कहा है -
‘यह जो वर्त्तमान सृष्टि है, इसमें सातवें (7) वैवस्त मनु का वर्त्तमान है, इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं। स्वायम्भव 1, स्वारोचिष 2, औत्तमि 3, तामस 4, रैवत 5, चाक्षुष 6, ये छः तो बीत गए हैं और सातवां वैवस्वत वर्त्त रहा है.’ (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, अथ वेदोत्पत्ति., पृ.17)


स्वामी जी ने बताया है कि एक मन्वन्तर में 71 चतुर्युगियां होती हैं। एक चतुर्युग में सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं। सतयुग में 1728000 वर्ष, त्रेता में 1296000 वर्ष, द्वापर में 864000 वर्ष और कलियुग में 432000 वर्ष होते हैं। इन चारों युगों में कुल 4320000 वर्ष होते हैं। 71 चतुर्युगियों में कुल 306720000 वर्ष होते हैं। छः मन्वन्तर अर्थात 1840320000 वर्ष पूरे बीत चुके हैं और अब सातवें मन्वन्तर की 28वीं चतुर्युगी चल रही है। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका लिखे जाते समय तक सातवें मन्वन्तर के भी 120532976 वर्ष बीत चुके थे। इस तरह स्वामी जी के अनुसार उस समय तक स्वयंभू मनु को हुए कुल 1960852976 वर्ष, एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख बावन हज़ार नौ सौ छहत्तर वर्ष बीत चुके थे।

स्वामी जी ने यही काल स्वयंभू मनु का बताया है, और उस काल के स्वयंभू मनु को मनु स्मृति का स्मृतिकार बतलाया है । उसमें जो श्लोक मनु के नाम से कहे गए हैं, वास्तव में उन्हें गुरू - शिष्य परम्परा में श्रुति - वाचिक प्रक्रिया के अंतर्गत पीढ़ी दर पीढ़ी स्मरण कर्तेभुये संरक्षित किया जा रहा था , जिसे बाद में लिपिबद्ध कर लिया गया ।  मनु स्मृति का स्वयंभू मनु से ही संबंध है। हालाँकि स्वामी दयानंद जी ने मनु स्मृति को प्रक्षिप्त मानकर उसके कुछ श्लोकों को नहीं माना है । उन्होंने कहा है कि मनुस्मृति के कुछ श्लोक प्रक्षिप्त हैं और उनका कुछ पता नहीं है कि उन्हें कब और किसने लिखा है?

भारतवर्ष में वेदों के उपरान्त सर्वाधिक मान्यताप्राप्त ग्रंथों में  ‘मनुस्मृति’ का ही नाम आता है। मनु महाराज के मनुस्मृति में चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मानव मात्र के जीवन में घटित होने सम्भव हैं यह सब धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है।
महर्षि बाल्मीकि रचित रामायण और महर्षि वेदव्यास (कृष्णद्वेपायन ) रचित महाभारत में मनुस्मृति के श्लोक व् मनु महाराज कि प्रतिष्ठा अनेकों स्थानो पर आयी है किन्तु मनुस्मृति में रामायण , महाभारत व बाल्मीकि , व्यास जी का नाम तक नही । हाँ ! मनुस्मृति में मनु महाराज ने वेदों का जिक्र किया है और वेदों की महिमा का गान अनेक श्लोकों में किया है ।
वेद के सन्दर्भ में अनेक वचन मनु स्मृति में आये है बल्कि यह कहना उचित होगा मनुस्मृति वेद सार ही है । अतः वेद मनु से प्राचीन है -
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम ।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु : समलक्षणम् ॥ मनु १/१३
जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारो ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराये उस ब्रह्मा ने अग्नि , वायु, आदित्य और [तु अर्थात ] अंगिरा से ऋग , यजुः , साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया ।

वेदोSखिलो धर्ममूलम् ।  मनु २/६
वेद सम्पूर्ण धर्म (कानून Law) का मूल है ।

यः कश्चित्कस्यचिधर्मो मनुना परिकीर्तित : ।
स सर्वोSभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ मनु २/९
मनु ने जिस किसी को जो कुछ भी धर्म कहा है वह सब वेद के अनुकूल ही है , क्योकि वेद सर्वमान्य है ।

नास्तिको वेदनिंदकः ।  मनु २/११
वेद कि निंदा करने वाले नास्तिक (अनीश्वरवादी) है


मनुस्मृति में वेदों का सार है । मनुमृति को बिना समझें उसकी निंदा करने वाले और उसे जलाने वाले धर्मद्रोहियों के लिए मनुस्मृति का यह श्लोक पठनीय है -
निषेकादिश्मशानान्तो मंत्रैर्यस्योदितों विधि: |
तस्य शास्त्रेsधिकारोsस्मिन्यज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित | – मनुस्मृति
मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों का वर्णन, वेद के जिस प्रकरण में है उसी को मनुस्मृति में लिया गया है , हमने उसके अतिरिक्त अपनी ओर से आँय कुछ भी नहीं कहा है !

मनुस्मृति में श्लोक ११/६ के माध्यम से कहा गया है कि वेद ही सर्वोच्च और प्रथम प्राधिकृत है। वेद किसी भी प्रकार के ऊँच-नीच, जात-पात, महिला-पुरुष आदि के भेद को नहीं मानते।

इत्यादि अनेक वचन है जो वेद के सन्दर्भ में मनु में आये है बल्कि यह कहना उचित होगा मनुस्मृति वेद सार ही है । अतः वेद मनु से प्राचीन है इसमें लेशमात्र भी संदेह नही ।
वैदिक व भारतीय पुरातन ग्रंथों के जानकारों कहना है कि मनुस्मृति में जहाँ कहीं भी वेद विरुद्ध आचरण दिखे वो प्रक्षेप (मिलावट ) है अतः त्याज्य है ।

Wednesday, November 6, 2013

सम्पूर्ण धर्म का मूल वेद

                                सम्पूर्ण धर्म का मूल वेद

वेदों की महता के सन्दर्भ में विभिन्न पुरातन वैदिक विद्वानों ने अपने विचार अपने ग्रंथों में अंकन किया है । मनुस्मृति के स्मृतिकार मनु महाराज वेद के विषय में अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं -
वेदोSखिलो धर्ममूलं ..... - मनुस्मृति 2 -6
अर्थात् पूर्ण धर्म का मूल वेद में है।
धर्म्जिग्यसमानानाम् प्रमाणं परमं श्रुतिः ।  - मनुस्मृति 2 - 13
अर्थात् धर्म के जिज्ञासुओं के लिए श्रुतिः (वेद) प्रमाण हैं।
मनु महाराज आगे कहते हैं -
पित्रिदेवमनुष्याणाम् वेदश्चक्षु: सनातनम् ।
अशक्यं चाSप्रमेय च वेद्शास्त्र्मिति स्थितिः ।। -
                              मनुस्मृति 12 -94
पितरों , देवों और मनुष्यों के लिए अनादि वेद नेत्र के समान हैं।
वेदों के सन्दर्भ में वृहदारण्यक उपनिषद् में भी अंकित है -
अरेSअस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद् यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोSथर्वान्गिरस । - वृहदारण्यक उपनिषद् 4 - 5 - 11
ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद परमात्मा के जी श्वास मात्र हैं ।
महाभारतकार कृष्णद्वैपायन वेदव्यास कहते हैं -
अनादिनिधना विद्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ।
    - महाभारत शांतिपर्व 233 - 24
अर्थात् आदि , अन्तरहित नित्य वाणी को परमात्मा ने प्रकट किया ।
वेदों के महान विद्वान् यास्काचार्य वेदों के विषय में कहते हैं -
स्थानुरण्यं भारहार : किलाभूदधीत्य वेदं न विजनाति योसSअर्थज्ञ इत्सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानबिधूतपाप्मा ।।
           - निरूक्त 1 -18
अर्थात् जो वेद को पढता है , बिना अर्थ जाने , वह (मनुष्य नहीं) भार उठाने वाला खम्भा होता है । (और) जो अर्थ को जानता है,(वह) सपूर्ण कल्याण को प्राप्त करता है।
महर्षि दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में कहा है कि जिस व्यापक अविनाशी सर्वोत्कृष्ट परमेश्वर में सब ब्रह्माण्ड और पृथ्वी आदि सब लोक स्थित हैं और जिसको सब वेद वर्णन करते हैं , उसको न जान कर , वेद पढने से भी कुछ नहीं होगा।
प्राचीन वैदिक ज्ञानियों ने वेदार्थ समझने और उसके अनुसार व्यवहार करने की महता के सन्दर्भ में वास्तविक ज्ञान का वैदिक ग्रन्थों में बृहत् वर्णन किया है , परन्तु मध्यकालीन वेद के भाष्यकारों ने अज्ञानवश अथवा जान - बुझकर वेद के ऐसे भाष्य किये जिससे वेदों के सन्दर्भ में मिथ्या धारणाओं को बल मिला।

Thursday, September 5, 2013

मजहब ही सिखलाता है आपस में बैर रखना

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना- जबकि तथ्य यह है कि पिछले पन्द्रह सौ वर्षों में विश्व में जितना खून मज़हब के नाम पर बहा है, उसकी कोई तुलना नहीं है। कत्ले-आम, बलात्कार, अत्याचार का तो कोई हिसाब नहीं। हिन्दू ने प्रत्येक मज़हब का स्वागत किया है और इसे हिन्दुस्तान में फलने-फूलने का अवसर दिया है। अब एक अन्य खतरनाक मज़हब ‘नास्तिक’ एकचुनौती बनकर आ रहा है। दुनिया में नास्तिक मत (कम्यूनिज़म) ने भी हंगरी इत्यादि देशों में कम रक्त नहीं बहाया। नास्तिक्य तथा कम्यूनिज़म भीमज़हब के अन्तर्गत आते हैं। अभी बीसवीं शताब्दी पर ही दृष्टि डालें तो देखेंगे कि हिन्दुस्तान जैसे कश्मीर से कन्याकुमारी तक, हिमालय से पुरी तक एक सूत्र में बँधे देश को तीन टुकड़ों में मज़हबी आधार पर विभाजित कर दिया गया। यह उस मज़हबी जनून का कमाल है जो ‘नहीं सिखाता आपस में वैर रखना।’ एक मात्र हिन्दू धर्म ही ऐसा है जिसने विश्व भर में मानवता का प्रचारकरने के लिए शान्ति दूत भेजे और बिना युद्ध किये विश्व भर को मानवता का पाठ पढ़ाया और प्रचार किया। इस पर भी हिन्दू को साम्प्रदायिक कहना या तो मूर्खता ही कही जायेगी अथवा धूर्तता। हिन्दू कोई मज़हब नहीं है। यह कुछ मान्यताओं का नाम है। वे मान्यताएं ऐसी हैं जो मानवता का पाठ पढ़ाती हैं। हिन्दुओं की धर्म पुस्तकों में मनुस्मृति का नाम सर्वोपरि है और मनुस्मृति धर्म का लक्षण करती है- धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचम् इन्द्रिय-निग्रह, धीर्विधा सत्यमक्रोधो दशकम धर्म लक्षणम्। कोईबताये इनमें कौन सा लक्षण ऐसा है जो मानवता के विपरीत है। स्मृति में धर्म का सार स्पष्ट शब्द में कहा है – श्रूयतां सर्वस्व श्रूत्वा चैवाव धार्यताम्, आत्मनः प्रतिकूलानि परेणाम् न समाचरेत।। (धर्म का सार सुनो और सुनकर धारण करो अपने प्रतिकूल व्यवहार किसी से न करो। ऐसे लक्षणों वाले धर्म को साम्रप्रदायिक कहना तो मूर्खता की पराकाष्ठा कही जायेगी। वास्तव में हिन्दू धर्म को न समझने के कारण दुनिया में अशान्ति मची हुई है। सम्पूर्ण भारत देशवासी हिन्दू ही हैं क्योंकि वे हिन्दुस्तान के नागरिक हैं। इस्लाम, ईसाई, पारसी, बौद्ध इत्यादि जो हिन्दुस्तान का नागरिक है वह हिन्दू ही है। हमारे राजनैतिक नेता तथा आज के कुशिक्षित लोग अन्धाधुन्ध, बिना सोचे समझे लट्ठ लिये हुए हिन्दू के पीछे पड़ जाते हैं। समस्या का हल तो है परन्तु राजनीति में आये स्वार्थी नेता अपना उल्लू कैसे सीधा करेंगे ? बच्चों की पाठ्य पुस्तक में एक पाठ इस विषय में हो, कि हिन्दू क्या हैं, इसके मान्यताएं क्या हैं, और भारत के प्रत्येक नागरिक जो भी भारतवासी है, वह हिन्दू ही है। हिन्दुओं की मान्यताएं शास्त्रोक्त हैं, बुद्घियुक्त हैं, किसी भी मज़हब के विरोध में नहीं। किसी भी मज़हब को मानने वाले वे हिन्दू की मान्यताओं को जो मानवता ही है, मान लें तो द्वेष का का कोई कारण नहीं रहेगा। संक्षेप में हिन्दू की मानताएं हैं- जोकि शास्त्रोक्त हैं, तथा युक्तियुक्त हैं, इस प्रकार हैं- 1. जगत् के रचयिता परमात्मा पर जो सर्वशक्तिमान हैं, अजर अमर है, विश्वास; 2. जीवात्मा के अस्तित्व पर विश्वास; 3. कर्म-फल पर विश्वास। इसका स्वाभाविक अभिप्राय है, पुनर्जन्म पर विश्वास; 4. धर्म पर विश्वास। धर्म जैसा कि मनुस्मृति में लिखा है, जिसका सार है-आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाम् न समाचरेत्।।

।। श्री शुकदेव चालीसा ।। रचनाकार- अशोक "प्रवृद्ध"

                                                      ।। श्री शुकदेव चालीसा ।।                                              रचनाकार- अशोक ...