Showing posts with label पुरातन ग्रंथ. Show all posts
Showing posts with label पुरातन ग्रंथ. Show all posts

Sunday, April 20, 2014

पुरातन ग्रंथों में प्रबंधन एवं योग्यता

पुरातन ग्रंथों में प्रबंधन एवं योग्यता 

पुरातन ग्रंथों में प्रबन्धन एवं योग्यता के सम्बन्ध में विवरण अंकित हैं । शुक्राचार्य निति में कहा है कि -

अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
— शुक्राचार्य

अर्थात - कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं ।

इसी प्रकार पंचतंत्र में कहा है -

कोऽतिभारः समर्थानामं , किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सविद्यानां , कः परः प्रियवादिनाम् ॥
— पंचतंत्र

अर्थात - जो समर्थ हैं उनके लिये अति भार क्या है ? व्यवस्सयियों के लिये दूर क्या है?
विद्वानों के लिये विदेश क्या है? प्रिय बोलने वालों के लिये कौन पराया है ?

।। श्री शुकदेव चालीसा ।। रचनाकार- अशोक "प्रवृद्ध"

                                                      ।। श्री शुकदेव चालीसा ।।                                              रचनाकार- अशोक ...