सिरासीता धाम ककड़ोलता
- अशोक 'प्रवृद्ध'
नया इंडिया, दिनांक- 2 फरवरी 2023
महाप्रलय के पश्चात आदिवासी समुदाय की उत्पति की कथा झारखण्ड प्रान्त के गुमला जिलान्तर्गत डुमरी प्रखण्ड के आकाशी ग्राम अवस्थित सिरासीता नाले से जुड़ी हुई है। सिरासिता नाले को ककड़ोलता के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि जब- जब पृथ्वी पर अधर्म और पाप में वृद्धि हुई है, तब-तब पृथ्वी पर प्रलय हुआ है। और उस प्रलय के बाद आदिवासी सरना धर्मावलंबियों का झारखण्ड के गुमला जिला के डुमरी प्रखण्ड के आकासी ग्राम अवस्थित इस धार्मिक स्थल सिरासिता नाले ककड़ोलता से हुई है। अर्थात मानव की उत्पत्ति यहीं हुई है। नदियों, ब्रुक, ब्रुकलेट्स और जंगल से घिरे झारखण्ड राज्य के पश्चिमी सीमा पर स्थित इस स्थल के पूर्वी सीमा में गुमला जिला का चैनपुर प्रखण्ड, उत्तर सीमा में लातेहार जिला पूर्ववर्ती पलामू का महुआडांड़ प्रखण्ड और दक्षिण-पश्चिम में छत्तीसगढ़ राज्य की सीमा है। झारखण्ड की राजधानी राँची से 175 किलोमीटर और गुमला जिला मुख्यालय से 75 किलोमीटर दूर एक ऊंची पहाडी के तले सिरासीता नाला नामक स्थल आदिवासी समाज की आस्था और विश्वास से जुड़ा है।

नया इंडिया, दिनांक- 2 फरवरी 2023
कहा
जाता है कि 1000 मीटर ऊंचे पहाड़ पर इसका
मुख्य स्रोत है। परन्तु पहाडी के नीचे अवस्थित आदिवासी समाज की आस्था और विश्वास
से जुड़े इस स्थल पर प्रतिवर्ष फरवरी महीने के प्रथम गुरुवार को सामूहिक धार्मिक
पूजा-अर्चना सह मेले का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष 2023
में
फरवरी का वह पहला गुरुवार 2 फरवरी को पड़ रहा है। 2 फरवरी
को यहाँ सिरासीता नाले के पूजन के लिए स्थानीय, धार्मिक
और प्रशासनिक स्तर पर विशेष तैयारी की जा रही है। इस मेले में बिहार, छतीसगढ़, असम, बंगाल, मध्य
प्रदेश, ओडिसा, नेपाल
के अतिरिक्त झारखण्ड के विभिन्न जिलों से लाखों आदिवासी शामिल होते हैं।
श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़ के साथ समाज के अगुआ, धर्म
गुरूगण भी शामिल होते हैं। श्रद्धालु जन पूजा- अर्चना कर मनोवांछित फल प्राप्ति की
कामना करते हैं, याचना करते हैं। मान्यता
है कि यहाँ जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह
अवश्य ही पूर्ण होती है।
सिरासीता
धाम, ककड़ोलता
से सम्बन्धित अनेक लोक कथाएं, किम्बदन्तियाँ
प्रचलित हैं। पाहन, माती, सोखा व
पुजारीगण आदि विभिन्न धार्मिक कृत्यों के बीच जनजाति समुदाय के उद्भव से संबंधित
धर्म गाथा गाई जाती है। दंडा- कट्ठा या भेलवाफरी पूजा के समय इस उद्भव धर्मगाथा
तथा असुर अवदान के गीतों को गाया जाना एक प्रथा बन चुकी है। पूर्वजों की यह मूल
कहानी बेलातपुर के राजा एवं एक राक्षस से संबंधित है। कथा के अनुसार बेलातपुर नामक
स्थान में एक राक्षस रहता था, जो
वहाँ के लोगों को अपना भोजन नित्य ही बनाया करता था। वह अपने निकट से गुजरने वाले
लोगों को मारकर खा जाता था।
इस
संकट से निबटने के लिए वहाँ के राजा एवं राक्षस के बीच एक लड़ाई हुई और दोनों के
बीच एक समझौता हुआ। राजा और राक्षस के मध्य हुई समझौते के अनुसार बेलातपुर के
लोगों को राक्षस को प्रतिदिन भरपेट भोजन के रूप में चावल आदि भोज्य पदार्थ देना
पड़ता था। इसके लिए प्रतिदिन बेलातपुर के एक परिवार के सदस्य को सैका चावल के साथ
राक्षस के पास जाना पड़ता था, लेकिन
भोज्य पदार्थ लेकर जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को राक्षस निगल जाता था। एक दिन एक
विधवा बुढ़िया के पुत्र की बारी आई। बुढ़िया के पुत्र का नाम धर्मेश (धर्मेस) था, और
उसकी बहूँ अर्थात धर्मस की पत्नी का नाम पार्वती था। बुढ़िया ने रोकर अपने पुत्र
को जाने से मना किया, परन्तु उसके पुत्र ने
नहीं मानी और 12 मन की तलवार उठाई, तेरह
मन का भला लिया। और जब छकड़े को चावल से भरकर चला तो राक्षस को तीन कोस दूर से ही
बैलगाड़ी की घंटी की भयानक आवाज सुनाई पड़ने लगी।
दूर से
ही राक्षस को लड़के ने कहा – अपना मुंह खोलो और मुझे भी खाओ। राक्षस ने यह सुन जब
अपना मुंह खोला तो तब लड़के ने उसके मुंह में भाला ठूंस दिया, और
तलवार से राक्षस को मार डाला। यह देख धर्मेश ने सोचा कि जब राक्षस का सड़ेगा, तब
उसकी दुर्गन्ध से मनुष्य खाना-पीना नहीं कर सकेंगे। इसलिए पाप के प्रतीक राक्षस के
शव को अग्नि वर्षा करके नष्ट कर देना चाहिए। धर्मेश की पत्नी पार्वती दयालु थी, वह
नहीं चाहती थी कि अग्निवर्षा से सृष्टि का नाश हो। उसने अपने पति धर्मेश से कहा
छोटे कटोरे से अग्नि बरसाओ। तब धर्मेश ने हनुमान को आदेश देते हुए कहा कि तुम सदा
मेरे साथ रहना। जब मैं अग्निवर्षा करूं तो तुम ढोल पीटना । जिससे लोग सतर्क होकर
अपनी सुरक्षा करें। पार्वती ने अपने पति से आधे कटोरे में अग्निवर्षा करने के लिए
कहा था, किन्तु
धर्मेश ने पीतल की थाली भरकर आग बरसा दी और हनुमान तेला नामक केंद्र फल खाने में
मग्न रहे, ढोल
पीटना भूल गए। तब भयंकर आग लगी । सभी देश, वनस्पति, प्राणी
भस्म हो गए, लेकिन पार्वती ने एक नर
एवं एक नारी भाई-बहन को गंगला झाड़ियों के बीच, जिसे
सिरा सीता कहा जाता है, केंकड़े के बिल में छुपा
दिया और उन्हें मसूर की आधा दाल खाने को दिया। वे इस पर 7 दिन और
7 रात
जीवित रहे। तब धर्मेश ने पार्वती से कहा कि प्रसाद के चढ़ावे से ही देवताओं का
भोजन होता है और प्रसाद चढ़ाने वाला कोई व्यक्ति नहीं होने के कारण मैं भूख से मर
रहा हूँ।
इस पर
पार्वती ने कहा मैंने आपसे थोड़ी अग्निवर्षा की प्रार्थना की थी, किन्तु
आपने अत्यधिक अग्निवर्षा कर दी। अब मनुष्य कहां मिलेंगे, जो
प्रसाद का चढ़ावा चढ़ाने आएंगे? तब
धर्मेश ने पार्वती से प्रार्थना की। तब पार्वती ने बताया कि दो प्राणी गंगला वैद्य
में छुपे हैं। यह सुन सोने की छड़ी लेकर धर्मेश चील्ह नामक एक पक्षी, कुत्ते
लिलि, भूली
और खैरी के साथ भैया बहन को ढूंढने निकले। तब कुत्तों ने मिलकर गंगला झाड़ी के बीच
केकड़े के बिल के पास भूंकना शुरू किया। धर्मेश ने नर-नारी युग्म को पा लिया। और
धर्मेश ने उन्हें हल दिया, बीज दिया। उनके लिए
दिन-रात बनाए।लेकिन जब उन्होंने चावल की खेती शुरू की, तो एक
ओर टिड्डियों ने और दूसरी और चूहे ने हानि पहुंचाने शुरू कर दी। इस पर धर्मेश ने
इस भैया बहन युग्म से कहा कि कृषि की रक्षा के लिए दण्डा- कट्टा या भेलवाफरी पूजा
करना चाहिए। इससे इस प्रकार की हानि नहीं होगी इससे नजर -गुजर से रक्षा होगी। यह
बताकर धर्मेश ने भाई-बहन के बीच लकड़ी का एक धींगरा रख दिया और कहा कि ओ मेरे
पौत्र! जब तुम इस लकड़ी के लट्ठे को पार कर उस तरफ जाकर सोओगे, तो
मानव जाति बढ़ेगी। इस प्रकार प्रथम भैया बहन से उरांव जाति का विस्तार हुआ।
ककड़ोलता
से सम्बन्धित एक अन्य कथा के अनुसार संसार में पाप में वृद्धि और धर्म का नाश होने
लगा, तो इसे
देख भगवान महादेव और माता पर्वती को अत्यंत दुःख हुआ। यह देख माता पार्वती का
हृदयं दग्ध हो उठा, और उन्होंने महादेव से
कहा कि अग्नि और जल से सम्पूर्ण पृथ्वी को भस्म कर दीजिए। पार्वती के कहने पर
उन्होंने पाप से भरे इस पृथ्वी को जलाने की सहमति दे जताते हुए आग और पानी को
पृथ्वी को जलाने के लिए भेजने गए। भेजने के पहले महादेव ने हनुमान से कहा कि मैं
आग और पानी को दुनिया को जलाने के लिए भेज रहा हूँ, जब आधा
पृथ्वी जल जाएगा, तब तुम जाकर डमरू को बजा
देना, तो आग
बुझ जाएगा, और पानी बरसना बंद हो
जाएगा।
हनुमान
को यह कहकर महादेव आग और पानी को पृथ्वी पर भेज दिए। पृथ्वी में अग्नि की वृद्धि
होने से अत्यधिक ताप को सहन नहीं कर पाने के कारण मानव, पेड़-पौधा, पशु-पक्षी, जीव-जंतु
सभी जल गए। और हनुमान उस समय चिटचिटी पेड़ पर चढ़कर फल खा आनन्द ले रहे थे। आग से
चिटचिटी पेड़ जब झुलसा तो हनुमान हवा में उड़ते हुए उपर जाकर डमरू को बजाने लगे।
तब तक सम्पूर्ण पृथ्वी पूरी तरह जल चुकी थी। यह सब देख कर माता पार्वती को भय
सताने लगा कि आधी पृथ्वी को जलाने को कहा था तो पूर्ण सृष्टि को ही जला दिया। इस
पृथ्वी से मानव जाति खत्म हो गया है। अब क्या होगा? कैसे
होगा मानव का सृजन?
यह
सोचते हुए माता पार्वती पृथ्वी को देखने लगी, तो
अचानक उनकी नजर दो बच्चों पर पड़ी। उन्हें देखकर माता पार्वती की जान में जान लौट
आई, और
उन्होंने उन दोनों भाई और बहन को सिरा और सीता नामक समीप अवस्थित एक जलस्रोत, जिसे
स्थानीय भाषा में नाला कहते है, नाले
स्थल और गंगला खइड़ (झुंड) के बीच ककड़ोलता में छिपा दिया। तत्पश्चात जब महादेव
वापस लौटे तो गुस्साई नजर से पार्वती ने उनसे कहा कि पूरा पृथ्वी जल गया। अब मानव
जाति ढूंढें से कहाँ मिलेंगे? सम्पूर्ण
संसार सुनसान हो गया। अब मानव का सृजन कैसे होगा? यह कह
माता पार्वती ने मानव को ढूंढ लाने का आदेश देते हुए महादेव से कहा कि जब- तक आप
मानव को ढूंढ नहीं लाते, तब तक मैं आपसे बात नहीं
करूंगी। यह सुनकर महादेव पूरी पृथ्वी का भ्रमण करने लगे। सम्पूर्ण घूमने के बाद एक
दिन महादेव अपने लिलि- भुली के संग सिरासिता नाले की ओर गये। गंगला खइड (झुंड) की
ओर देख कर लिलि- भूली भूंकने लगी। उनके भौंकने के समय ही समय महादेव ने दोनों
भाई-बहन को ककड़ोलता में घुसते हुए देख लिया, और वे
दोनों भाई- बहन को लेकर पार्वती के पास पहुंचे और पार्वती को बताया कि दोनों भाई
-बहन को सिरासिता नाले के गंगला खइड़ से ढूंढ़कर ला रहा हूँ।
इसके
बाद महादेव और पार्वती ने दोनों को पाल पोसकर बड़ा किया। जिसके बाद मानव की
उत्पत्ति शुरू हुई। यही कारण है कि आदिवासियों में मान्यता है कि आदिवासियों के
पुरखों की उत्पति सिरासिता नाले के ककड़ोलता से ही हुई है, और यही
मानव उत्पत्ति स्थल है। यहाँ भक्ति भाव से पूजन– अर्चा से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण
होती हैं। हाल के वर्षों में स्थानीय स्तर पर आरम्भ की गई प्रार्थना सभाओं में भी
सिरासिता नाले के ककड़ोलता को ही मानव उत्पत्ति स्थल मानकर प्रार्थना की जाती है।
स्थानीय स्तर पर उरांव भाषा कुडुख में गाई जाने वाली गीतों- सिरा-सिता नाल नू, ई
उल्ला जुड़ी ददा बआ लइक्कन, आदि गीतों और लोक कथाओं
में भी सिरासिता नाले व ककड़ोलता से सम्बन्धित इस कथा की पुष्टि ही होती है।
बहरहाल
जनजातीय मान्यता की इस धार्मिक स्थल, आस्था
की प्रतीक, सरना आदिवासियों की
बिश्वास स्थली सिरासिता नाला- ककड़ोलता और यहाँ तक पहुँचने का मार्ग आज भी विकास
की बाट जोह रहा है। सुविधाओं को तरस रहा है। यहाँ तक लोगों को आवागमन करने में
स्थानीय लोगों और पर्यटकों को काफी परेशानी, भारी
कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, फिर भी
नित्यप्रति ही अनेक राज्यों के श्रद्धालु इस स्थल पर जमा होते है, पूजा –
अर्चना करते हैं, और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण
होने की प्रार्थना व कामना करते हैं। समीप ही नौगाई डेम है, जहाँ
स्थानीय स्तर पर नौकायन व मत्स्य पालन की सुविधाएँ विकसित किये जाने की सख्त
आवश्यकता है। क्योंकि यहाँ भी काफी संख्या में स्थानीय शौकीनों व बाहरी पर्यटकों
का आवाजाही लगा रहता है।
