Sunday, February 1, 2026

प्रकृति पूजा, शिव व देवी की पूजा आदि कई समानताएं हैं सरना व सनातन में

             प्रकृति पूजा, शिव व देवी की पूजा आदि कई समानताएं हैं सरना व सनातन में

                                        -अशोक “प्रवृद्ध”

                          लेखक, आध्यात्मिक चिन्तक और साहित्यकार


उत्कल मेल, 31 जनवरी 2026 



जनवरी 2026 में द्विदिवसीय रांची, झारखण्ड यात्रा के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के द्वारा जनजाति संवाद कार्यक्रम में सरना पूजा- पद्धति की सनातन धर्म से समानता को लेकर की गई टिप्पणी के बाद यह मुद्दा बहस के केंद्र में है। कार्यक्रम के दूसरे दिन 24 जनवरी को जनजाति संवाद कार्यक्रम में मोहन भागवत ने स्पष्ट रूप से कहा कि सरना एक पूजा पद्धति है, न कि कोई अलग धर्म हिन्दू धर्म की परिभाषा देते हुए भागवत ने तर्क दिया कि हिन्दू धर्म किसी विशेष पूजा पद्धति का नाम नहीं है, बल्कि यह एक समावेशी जीवन पद्धति और साथ रहने का तरीका है। उन्होंने आदिवासियों को सनातन संस्कृति और धर्म का मूल आधार बताया। उनके अनुसार, जिस दिन जनजाति समाप्त होगी, उसी दिन सनातन भी समाप्त हो जाएगा। उन्होंने जोर दिया कि सरना को अलग धर्म के रूप में देखना समाज को तोड़ने का प्रयास है और बाहरी ताकतों को शोषण का मौका देना है। भले ही कोई पेड़ की पूजा करे या पहाड़ की, सभी का भाव एक ही है, जो सनातन मूल्यों से जुड़ा है।

उनके इन बयानों पर प्रक्रिया स्वरूप पूरे झारखण्ड में बयानों की बाढ़ आ गई, अनेक राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं, जहां विपक्ष ने सरना धर्म कोड की मांग को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रुख की आलोचना की, वहीं अनेक जनजातीय नेताओं ने उनके बयान का समर्थन करते हुए कहा कि कुछ वर्ष पूर्व तक हम जनजातीय बन्धु भी अपने आंगन में चीरा झंडा नहीं बल्कि महावीरी झंडा फहराया करते थे, आंगन में तुलसी चबूतरा में लगे तुलसी माता की पूजा किया करते थे और हिन्दू पर्व- त्योहारों में ख़ुशी से भाग लेते थे और तत्संबंधी पूजा पाठ विधि- विधानपूर्वक करते था आज भी अधिकांश सरना आदिवासी रामनवमी, नवरात्र, महाशिवरात्रि, होली आदि पर्व त्योहारों का आयोजन करते हैं और पूजा -पाठ में भाग लेते हैं।

 

उत्कल मेल, नई दिल्ली, 31 जनवरी 2026 

 

उल्लेखनीय है कि सरना शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अर्थात धार्मिक पहचान के रूप में उदय 1930 के दशक में हुआ था, जब सरना धर्म अर्थात सरनावाद को एक सामूहिक धार्मिक पहचान के रूप में छोटा नागपुर क्षेत्र वर्तमान झारखण्ड में प्रचारित किया गया था। सरना शब्द मूल रूप से मुंडारी भाषा के शब्द सर से निकला है, जिसका अर्थ पवित्र साल वृक्षों का झुरमुट होता है। परंपरागत रूप से यह शब्द आदिवासियों के पूजा स्थल (सरना स्थल) को संदर्भित करता है। हालांकि यह मूल रूप से मुंडारी शब्द है, लेकिन कालांतर में उरांव, हो आदि अन्य जनजातियों ने भी इसे अपनी धार्मिक पहचान के रूप में अपनाया, जो आदिवासियों में इसकी सामूहिक स्वीकार्यता का द्योतक है। सरकारी दस्तावेजों में 1970 के दशक से आदिवासियों ने जनगणना के दौरान अपनी धार्मिक पहचान सरना के रूप में दर्ज करानी शुरू की। 1971 की जनगणना में पहली बार लगभग 3,00,000 लोगों ने स्वयं को सरना धर्मावलंबी बताया था। सरना कोड की पहली औपचारिक मांग 1980 के दशक में तत्कालीन बिहार वर्तमान झारखण्ड प्रदेश के लोहरदगा संसदीय क्षेत्र के सांसद कार्तिक उरांव द्वारा की गई थी। वस्तुतः, एक विशिष्ट पूजा स्थल के रूप में यह शब्द प्राचीन काल से प्रचलित है, लेकिन एक संगठित धार्मिक शब्द के रूप में इसका व्यापक प्रयोग 1930 के दशक से शुरू हुआ।1980 के दशक में इसकी मांग शुरू है, और अब यह मांग एक विकराल रूप धारण कर चुकी है।  

 

बिरसा का गांडीव, 30 जनवरी 2026 

 
सरना और सनातन हिन्दू धर्म के बीच संबंध को लेकर कई मत और दृष्टिकोण प्रचलित हैं अनेक आदिवासी संगठनों और विद्वानों का तर्क है कि सरना एक पूरी तरह से स्वतंत्र प्रकृति आधारित धर्म है। इनके अनुसार सरना धर्म में मूर्तियों की पूजा नहीं होती, बल्कि पेड़ों, पहाड़ों और नदियों (प्रकृति) की सीधे पूजा की जाती है। इसका कोई धर्मग्रंथ नहीं है। सनातन धर्म के वेद, उपनिषद आदि ग्रंथों के विपरीत सरना की परंपराएं मौखिक हैं और इनमें कोई लिखित धर्मग्रंथ नहीं होता। सरना समाज में हिन्दू धर्म जैसी जाति अथवा वर्ण व्यवस्था नहीं होती है। सरना मान्यताओं में आमतौर पर पुनर्जन्म या कर्म के सिद्धांत की वह अवधारणा नहीं है जो सनातन धर्म का मूल आधार है। अनेक आदिवासी लोग अंतिम संस्कार में मृतक का शव दाह करते हैं, लेकिन कई आदिवासी समुदायों में शवों को जलाने के बजाय दफनाने की परंपरा है। सरना को सनातन का हिस्सा मानने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे कई धार्मिक व सांस्कृतिक संगठनों का मानना है कि सरना वास्तव में सनातन धर्म का ही एक वनवासी रूप है। प्राचीन ऋषि- मुनियों के अरण्य संस्कृति के अभिन्न अंग हैं सनातन धर्म में भी तुलसी, पीपल, पर्वत, नदियां आदि प्रकृति की पूजा का विधान है, इसलिए यह भिन्न नहीं है। दोनों के ही साझा सांस्कृतिक मूल्य हैं। दोनों ही जीवन के प्रति आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखते हैं और कई स्थानीय देवता व परंपराएं आपस में मिलती-जुलती हैं। दोनों का ऐतिहासिक जुड़ाव भी समान है। कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि आदिवासी प्राचीन काल से ही हिन्दू समाज का अभिन्न अंग रहे हैं, जिसका प्रमाण रामायण-महाभारत आदि प्राचीन ग्रंथों में भी अंकित मिलते हैं।


वर्तमान में झारखण्ड जैसे राज्यों में सरना धर्म कोड की मांग जोर पकड़ रही है ताकि आगामी जनगणना में आदिवासियों को अपनी एक अलग धार्मिक पहचान दर्ज करने का विकल्प मिल सके। आधिकारिक तौर पर अभी इसे एक अलग धर्म की मान्यता नहीं मिली है और जनगणना के दौरान यह हिन्दू अथवा अथवा अन्य श्रेणी में दर्ज किया जाता रहा है। सरना और सनातन दोनों ही प्राचीन और सांस्कृतिक गहराई से जुड़े हुए हैं। दोनों धर्मों में एकता और समरसता का भाव है, और दोनों ही धर्मों में प्रकृति और जीवन की महत्ता को माना जाता है। सरना धर्म में भी एक सर्वशक्तिमान शक्ति को माना जाता है, जिसे थान कहा जाता है, जबकि सनातन धर्म में भगवान (भूमि, गगन, वायु, आकाश अर्थात अंतरिश अग्नि व नीर) को माना जाता है। महादेव, पार्वती, श्रीराम, बजरंग बली हनुमान आदि अनेक सनातन देवी- देवता पूज्य माने जाते हैं। 

 

प्रातः आवाज, रांची व हजारीबाग, 31 जनवरी 2026 

इसमें कोई शक नहीं कि इन दोनों धर्मों के बीच एकता और समानता को देखते हुए इन दोनों धर्मों को एक दूसरे के साथ जोड़कर एक नई दिशा दी जा सकती है। सनातन धर्म में प्रकृति पूजा का बहुत महत्व है। वेद, उपनिषद, पुराण आदि ग्रंथों में भी पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, जल, वायु, अग्नि आदि प्रकृति के विभिन्न तत्वों की महता, उपयोगिता के मद्देनजर उनके प्रति पूज्य भाव दिखलाया गया है। प्राचीन ऋषि-मुनियों ने प्रकृति को देवतुल्य अर्थात भगवान का रूप माना है और उसकी पूजा करने का महत्व बताया है। सूर्य को भगवान सूर्य नारायण, चंद्रमा को भगवान चंद्रमा, और पृथ्वी को माता कहा जाता है सनातन धर्म में प्रकृति पूजा का बहुत महत्व है, और यह सरना धर्म के साथ एक समानता है। दोनों धर्मों में प्रकृति की पूजा और आदर का महत्व है। सरना धर्म में भी महादेव शिव और देवी की पूजा का महत्व है। आदिवासी समुदाय में शिव को बड़ा देव और देवी को जगत जनेनी कहा जाता है। सरना धर्म में प्रकृति की पूजा के साथ-साथ शिव और देवी की पूजा भी की जाती है, जो कि सनातन धर्म के साथ एक और समानता है। दोनों धर्मों में शिव और देवी की पूजा का महत्व है, और दोनों ही धर्मों में इनको शक्ति और प्राकृतिक ऊर्जा के रूप में माना जाता है। इस तरह सरना धर्म को सनातन धर्म का एक हिस्सा अथवा आदिवासी हिन्दू धर्म माना जा सकता है, क्योंकि इसमें आदिवासी संस्कृति और हिन्दू धर्म के तत्वों का मिश्रण है। इसमें प्रकृति पूजा, शिव व देवी की पूजा, और वेदों का महत्व आदि सनातन धर्म के कई तत्व शामिल हैं। कई आदिवासी समुदाय खुद को हिन्दू मानते हैं और सरना धर्म को अपना धर्म मानते हैं। विद्वानों के अनुसार वेदों पर आधारित सनातन वैदिक धर्म को सबसे प्राचीन और मूल धर्म माना जाता है, इसमें परमात्मा की एकता और सृष्टि के नियमों का महत्व है। सनातन धर्म को परमात्मा द्वारा बनाया गया माना जाता है, जबकि अन्य पंथ या मजहब मानव निर्मित हो सकते हैं। 



 

प्रकृति पूजा, शिव व देवी की पूजा आदि कई समानताएं हैं सरना व सनातन में

              प्रकृति पूजा , शिव व देवी की पूजा आदि कई समानताएं हैं सरना व सनातन में                                         -अशोक “प्रवृद्...