Sunday, February 16, 2014

वेद व्यास के अनुसार पृथ्वी का भोगोलिक मानचित्र

वेद व्यास के अनुसार पृथ्वी का  मानचित्र

पंचम वेद अर्थात श्रीकृष्ण द्वैपायन वेदव्यास कृत  महाभारत  मे पृथ्वी के मानचित्र निर्माण की सरल विधि का अंकन सर्वप्रथम  मिलता है .आधुनिक काल मे माना जाता है कि क्रिस्टोफ़र कोलंबस ( 31 अक्टूबर 1451-20 मई 1506 ). ने  अर्थात लगभग 525 वर्ष पूर्व  पृथ्वी का प्रथम भोगोलिक मानचित्र बनाया. महाभारत का समय कम से कम 5000 वर्ष ईसा पूर्व अर्थात आज से कम से कम 7000 वर्ष पूर्व का माना जाता है उसी समय महान दिव्यद्रष्टा ऋषि वेद व्यास ने महाभारत नामक धार्मिक व एतिहासिक ग्रन्थ की रचना की. जिसमे उन्होंने स्पष्ट रूप से पृथ्वी की भोगोलिक स्थति का उल्लेख किया. 
उन्होंने लिखा: सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु  कुरुनन्दन. परिमण्डलो महाराज द्वीपोसौ चक्रसंस्थितः. यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः. एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले. . द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान् - वेद व्यास, भीष्म पर्व, महाभारत अर्थात: हे कुरुनन्दन! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है. इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो ​​अंशो मे महान शश (खरगोश) दिखायी देता है. अब यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करे तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र से बहुत समानता दिखाता है .यह  मानचित्र 11 वीं शताब्दी में रामानुजचार्य द्वारा महाभारत के उपरोक्त श्लोक को पढ्ने के बाद बनाया गया था | 
इसके अतिरिक्त श्री विष्णुपुराण में सम्पूर्ण पृथ्वी का विस्तार से उल्लेख मिलता है

Friday, February 7, 2014

खाङ्ग्रेस अर्थात कांग्रेस के पतन का कारण

खाङ्ग्रेस अर्थात कांग्रेस के पतन का कारण

भारतवर्ष संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक देश है और खाङ्ग्रेस अर्थात कांग्रेस पार्टी छद्म स्वाधीन भारतवर्ष में सबसे पुरानी पार्टी है । दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि भारतीय लोकतंत्र से भी ज्यादा उम्र खाङ्ग्रेस अर्थात
कांग्रेस पार्टी की है। बावजूद इसके अत्यंत शर्मनाक बात यह है कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र काफी कमजोर है, जिसके बारे में भारतवर्ष की विभाजन की जिम्मेदार पार्टी कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी बार-बार कहते रहे हैं , लेकिन अब - तक इसमें कोई सुधार नहीं हो सका है। हद तो यह है कि इतनी पुरानी पार्टी का कोई भी प्रदेश इकाई अब भी अपना प्रदेश अध्यक्ष नहीं चुन सकती है एवं चुनाव जीतने के बाद भी चुने कांग्रेसी नेता मिलकर अपना मुख्यमंत्री नहीं चुन सकते हैं और राज्यों से संबंधित कोई बड़ा नीतिगत निर्णय भी पार्टी के नेता नहीं ले सकते हैं। और अंततः कांग्रेस अलाकमान को ही दिल्ली से राज्यों के लिए निर्णय लेना पड़ता है। जब पार्टी में ही लोकतंत्र इतना कमजोर है तो पार्टी कैसे एक साथ खड़ी रह सकती है? लेकिन इसे भी बड़ी बात यह है कि पार्टी के नेताओं को इससे मतलब नहीं है और वे अपना गुटबाजी में व्यस्त रहते हैं। ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस का पतन तय है।

दूसरी बात यह है कि कांग्रेस अबतक पारंपरिक वोटरों के सहारे , बदौलत ही देश में सबसे ज्यादा समय तक राज करती रही है। लोगों की नज़रों में चूंकि भारतवर्ष की स्वाधीनता - संग्राम की लड़ाई कांग्रेस नामक संगठन ने लड़ी और देश को मिली छद्म स्वाधीनता को भी खाङ्ग्रेस ने ही स्वतन्त्रता के नाम पर प्रचारित किया और इसके बाद में यह संगठन राजनीतिक दल का स्वरूप ले लिया। फलस्वरूप, देश की भोली - भाली जनता , और पिछड़े - दलित लोग कांग्रेस को वोट देते रहे। लेकिन इस बीच कांग्रेस पार्टी ने शायद इस गलत फहमी में कैडर नहीं खड़ा किया कि उसके साथ पारंपरिक मतदाता हमेशा रहेंगे लेकिन वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मदद से पार्टी के लिए बड़े पैमाने पर कैडर खड़ा किया, जिसके लिए उन्होंने ‘हिन्दी, हिन्दु हिन्दुस्तान’ जैसा पुरातन सनातनी नारों का सहयोग लिया। इतना ही नहीं कांग्रेस पार्टी ने विकास के नाम पर बहुसख्यक हिन्दुओं और खेती - किसानी से जुड़े किसानों को संसाधनहीन बना दिया, जिससे उसकी पारंपरिक वोट खिसक गई और बहुसख्यक हिन्दू आज अपने दुर्दशा के लिए कांग्रेस पार्टी को ही जिम्मेदार मानती है । वहीं दूसरी ओर भाजपा ने पुरातन गौरवमयी भारतवर्ष के स्वदेशी व स्थानीय तकनीक से विकास और एक भारतवर्ष श्रेष्ठ भारतवर्ष का एक महा गठजोड़ तैयार कर इस लोकसभा चुनाव में उतरने का मन बना लिया है , जिसका नेतृत्व नरेन्द्र मोदी को प्रदान किया गया है। और इस गंठजोड़ को आर्य सनातन वैदिक धर्मावलम्बी हिन्दुओं , देश में व्यवसाय और समुचित सर्वांगीण विकास के इच्छुक मध्यवर्ग का समर्थन मिलता दिखाई पड़ता है, जिससे कांग्रेस ने समझने की बड़ी देर व  भूल की ।

तीसरी परम सत्य बात यह है कि कांग्रेस के अंदर वंशवाद परम्परा और भाई-भतीजावाद की लड़ाई ने ही पार्टी को कमजोर कर दिया है और अगर इसे जल्द से जल्द नहीं निपटाया गया तो कई राज्यों में कांग्रेस गर्त में चली जाएगी। उदाहरण के तौर पर झारखंड के रांची स्थित हटिया विधानसभा सीट पिछले विधानसभा उप-चुनाव से पहले तक कांग्रेस का पारंपरिक सीट हुआ करता था। लेकिन कांग्रेस नेता गोपालनाथ सहदेव की मृत्यु के बाद झारखंड के ताकतवर कांग्रेसी नेता सुबोधकांत सहाय द्वारा जनाधारहीन वाले अपने भाई सुनीलकांत सहाय को टिकट दिलवाने के कारण कांग्रेस अपना पारंपरिक सीट गवां बैठी और आजसू जैसी नवसिखुआ पार्टी को वह सीट मुफ्त में मिल गई। इसी तरह छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी अपना बेटे  अमित जोगी और पत्नी को टिकट दिलवाने के कारण पार्टी को गर्त में ले गए। पिछला चुनाव में तो यहां तक कहा गया कि अजीत जोगी ने ही अपने पार्टी के सात उम्मीदवारों को हरवाया। यह इसलिए क्योंकि वे छत्तीसगढ़ कांग्रेस में अपना दबदबा बनाकर रखना चाहते हैं इसलिए वे कोई भी तकतवार नेता को उभरने का मौका देते हैं। गत दिनों माओवादी हमले में मारे गए अधिकाँश छतीसगढ़ी  खाङ्ग्रेसियो की घटने में भी प्रदेश कांग्रेस में भाई - भतीजावाद और वंशवाद का ही हाथ बताया जाता है ।

चौथी बात यह है कि कांग्रेस पार्टी के अंदर विभिन्न राज्यों में नेतृत्व का दोहरा लड़ाई चल रहा है। झारखंड जैसे राज्यों में पहली लड़ाई आदिवासी बनाम गैर-आदिवासी नेतृत्व का है। चूंकि झारखंड पहला ऐसा राज्य है जो आदिवासियों के नाम पर बना है इसलिए राज्य का नेतृत्व आदिवासियों के हाथ से छिना नहीं जा सकता है। यह इसलिए भी क्योंकि आदिवासी लोग कांग्रेस के पारंपरिक वोटर रहे हैं लेकिन संघ परिवार द्वारा आदिवासियों के बीच अपना जनाधार बढ़ाने और झारखंड आंदोलन की वजह से आदिवासी वोट बैंक कांग्रेस, भाजपा और झारखंडी पार्टियों के बीच बिखर गई, जिसे सबसे ज्यादा हानि कांग्रेस को ही उठानी पड़ी है। ऐसी स्थिति में अगर राज्य का नेतृत्व गैर-आदिवासियों के हाथों में जाने से स्थिति और भी ज्यादा भयावह हो सकती है। लेकिन वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के सवर्ण नेता इस बात को पचा ही नहीं पा रहे हैं कि वे आदिवासी नेताओं के नेतृत्व में आगे बढ़े। इसलिए आदिवासी और गैर-आदिवासी नेताओं के बीच कलह बरकरार रहना तय है। इतना ही नहीं आदिवासी नेताओं के बीच भी एकता नहीं दिखती है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू और वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव उरांव का झगड़ा आम जनता के सामना कई मरतबा खुलकर आ चुकी है। प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत प्रदेश की शिक्षा मंत्री गीताश्री उराँव की कार्य प्रणाली से नाखुश रहते हैं । जब प्रदेश के नेताओं के बीच ही एकता नहीं है तो पार्टी कैसे आगे बढ़ सकती है। इसके अलावे कई राज्यों में कांग्रेस के पास ऐसा को करिश्माई नेता भी नहीं है जो अपने दम पर पार्टी को पटरी पर ला सके और नेताओं के बीच चल रहे गुटबाजी को खत्म करते हुए सत्ता तक पहुंचे।  

पांचवी बात यह है कि देश के लिए दो महत्वपूर्ण मुद्दा - भ्रष्टाचार, मंहगाई कांग्रेस के शासनकाल में अत्याधिक बढ़ती गई। देश के तीन बड़े अर्थशास्त्री - डा. मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम और मोटेक सिंह अहलुवालिया के शासनकाल में सरकार का एजेंडा सिर्फ और सिर्फ देश की आर्थिक तरक्की रही है। और इस तरक्की को सुनिश्चित करने के लिए तथाकथित लालगलियारा में ऑपरेशन ग्रीनहंट चलाया जा रहा है ताकि इन इलाकों को खाली कराकर पूंजीपतियों के हवाले कर दिया जाये। फलस्वरूप, नक्सलियों ने भी कांग्रेस नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और नेता डर से गांवों में भ्रमण करना छोड़ दिये हैं। इसी तरह कई बार वादा करने के बाद भी केन्द्र सरकार मंहगाई को काबू नहीं कर पायी और जरूरत की चीजों की कीमत लगातार बढ़ती ही जा रही है। वहीं दूसरी ओर जयराम रमेश जैसे केन्द्रीय नेताओं को भी ग्रासरूट में पार्टी को बढ़ाने की चिंता नहीं है सिर्फ वे अपना नाम चमकाने के लगे रहते हैं। जब ये नेता सुदुर इलाकों में पहुंचते हैं तो वहां के स्थानीय नेताओं तक का पता नहीं होता है। कभी-कभी तो उन्हें केन्द्रीय नेताओं से भी मुलाकत करने के लिए मशक्कत करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस की जमीन लगातार घिसकती जा रही है। 

Wednesday, February 5, 2014

अधिकार परस्त लोग निकम्मे होते हैं ,परन्तु मनुष्य को कर्मशील और कर्तव्यशील बने रहकर ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए । - अशोक "प्रवृद्ध"

अधिकार परस्त लोग निकम्मे होते हैं ,परन्तु मनुष्य को कर्मशील और कर्तव्यशील बने रहकर ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए ।
अशोक "प्रवृद्ध"

स्वाधीन भारतवर्ष में खाङ्ग्रेसी सरकार के अनुदान अर्थात सब्सिडी निति के परिणामस्वरूप भारतीय अब सारे कार्यों के लिए लोग राज्य की ओर टकटकी लगाये रहकर देखते रहते हैं। अधिकार परस्त लोग निकम्मे होते हैं और भारतवर्ष में खाङ्ग्रेसियो और साम्यवादी - कम्युनिस्टों ने मिलकर ऐसे ही समाज का निर्माण किया है।

जबकि भारतवर्ष की आदि सनातन काल से ही चली आ रही आश्रम व्यवस्था का तो शाब्दिक अर्थ भी आ+श्रम=श्रम से परिपूर्ण है। पुरातन वैदिक ग्रंथों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि मानव - जीवन के सभी चारों ही अवस्थाओं अर्थात आश्रमों में श्रम की आवश्यकता और महता बतलाई गई है । ब्रहमचर्याश्रम में विद्याध्ययन का श्रम है, गृहस्थ में गृहस्थी को चलाने का श्रम है, वानप्रस्थ में पुन: खोयी हुई शक्ति को हासिल करने का श्रम है तो संन्यास आश्रम में अर्जित ज्ञान को पुन: समाज के लिए बांटने का श्रम है। निकम्मा कोई नहीं है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि मानव जीवन की चारों ही अवस्थाओं में श्रम साध्य है । इसीलिए वेद में भगवान् ने कहा है -
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतम् समा नर:।

अर्थात मनुष्य को कर्मशील और कर्तव्यशील बने रहकर ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। नागरिक विषयों में राज्य का हस्तक्षेप कम से कम तभी होगा जब नागरिक  स्वभावत: कत्र्तव्य परायण होंगे, कर्मशील होंगे और एक दूसरे के प्रति सहयोग का भाव रखते होंगे।

Wednesday, January 29, 2014

वेद पठन - पाठन

वेद पठन- पाठन

वेद पढ़ने का अधिकार प्रत्येक मनुष्य को है ।
 शूद्र भी वेद पढ़ सकता है ।
जो व्यक्ति विद्या -विहीन हो वह वेद कैसे पढ़ेगा ? हाँ जो व्यक्ति पढ़ा- लिखा है वह वेद पढ़ सकता है । ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र सभी को वेद पढ़ने का अधिकार है । किसी को भी वेद पढ़ने से मना नहीं किया जा सकता ।
स्त्री -जाति को भी वेद पढ़ने की अधिकार है ।
वेद में सभी वर्णों के कर्तव्य बतलाए गए हैं ,मनुष्य मात्र के लिए उपदेश दिया गया है ।नारी जाति के लिए भी उपदेश दिया गया है ।अब यदि किसी वर्ण या नारी जाति को वेद के पठन -पाठन से मना कर दिया जाए तो उन्हें अपने कर्तव्य कर्मों का ज्ञान नहीं हो सकेगा । वे धर्मं , अर्थ , काम और मोक्ष के बारे में नहीं जान पाएंगे। इससे ईश्वरीय उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकेगी । ईश्वर का उद्देश्य मनुष्य मात्र को सत्य -ज्ञान का उपदेश देना है । अतः सब को वेद पढ़ने का अधिकार मानना पड़ेगा ।

वेद पढ़ने से लाभ
वेद पढ़ने से अनेक लाभ हैं । मनुष्य को सत्य का ज्ञान होता है । वेद पढ़कर ही मनुष्य धर्मं , अर्थ , काम और मोक्ष के बारे में ठीक -ठीक जान सकता है ।अपने कर्तव्य -कर्मों का ज्ञान वेद के पठन एवं पाठन से ही हो सकता है । वेद के पढ़ने से प्राप्त सत्य - ज्ञान द्वारा मानसिक शांति मिलती है ।मनुष्य सच्चा सुख प्राप्त करता है ।वेद पढ़ने से प्राप्त ज्ञान द्वारा आत्मा की उन्नति होती है । वह दिन पर दिन शुद्ध पवित्र होता जाता है । उसके ऐश्वर्य , यश , वर्चस आदि में वृद्धि होने लगती है । वैदिक ज्ञान से ही आत्मा की मुक्ति संभव है ।

वेद के नहीं पढ़ने से मनुष्य सत्य - ज्ञान के अभाव में मिथ्या -ज्ञान में फंस जाता है ।अधर्म को ही धर्मं समझ लेता है । अधर्म का ही आचरण करने लगता है । इसलिए दुःख उठता है । धर्मं , अर्थ , काम और मोक्ष की सिद्धि से दूर होता जाता है । उसका जीवन दुखी हो जाता है ।मानवशरीर पाना व्यर्थ हो जाता है । आज संसार में जो दुःख और अशांति फैली हुई है इसके मूल में मानव द्वारा वेद पठन - पाठन को छोड़ देना ही है ।

वेद विभाग और वेद के विषय

वेद-विभाग और वेद के विषय

वेद के चार विभाग हैं --जिन्हें ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद के नाम से जाना जाता है ।
इस विभाजन का आधार है --उन में वर्णित विषय ।

ऋग्वेद में विज्ञान का वर्णन है । ऋग्वेद विज्ञान कांड है ।
यजुर्वेद में क्रिया और गति का वर्णन है । यजुर्वेद कर्म कांड है । सामवेद में उपासना का वर्णन है। सामवेद उपासना कांड है । अथर्ववेद में ज्ञान का वर्णन है । अथर्ववेद ज्ञान कांड है ।

ऋग्वेद का विभाग मंडलों में किया गया है । मंडल का अनुवाकों में और अनुवाक का सूक्तों में विभाग किया गया है । ऋग्वेद में दस मंडल हैं । ऋग्वेद के प्रथम मंडल में २४ अनुवाकों के १९१ सूक्तों में १९७६ मंत्र हैं ।
द्वितीय मंडल में ४ अनुवाकों के ४३ सूक्तों में ४२९ मंत्र हैं ।
तृतीय मंडल में ५ अनुवाकों के ६२ सूक्तों में ६१७ मंत्र हैं ।
चतुर्थ मंडल में ५ अनुवाकों के ५८ सूक्तों में ५८९ मंत्र हैं ।
पंचम मंडल में ६ अनुवाकों के ८७ सूक्तों में ७२७ मंत्र हैं ।
षष्ठ मंडल में ६ अनुवाकों के ७५ सूक्तों में ७६५ मंत्र हैं ।
सप्तम मंडल में ६ अनुवाकों के १०४ सूक्तों में ८४१ मंत्र हैं ।
अष्टम मंडल में १० अनुवाकों के १०३ सूक्तों में १७२६ मंत्र हैं । नवम मंडल में ७ अनुवाकों के ११४ सूक्तों में १०९७ मंत्र हैं ।दसम मंडल में १२ अनुवाकों के १९१ सूक्तों में १७५४ मंत्र हैं । इस प्रकार ऋग्वेद में कुल मिला कर ---
दस मंडलों में ८५ अनुवाकों के १०२८ सूक्तों में १०५८९ मंत्र हैं ।


यजुर्वेद का विभाग अध्यायों में किया गया है । यजुर्वेद में कुल ४० अध्याय हैं । यजुर्वेद के ४० अध्यायों में कुल १९७५ मंत्र हैं ।

सामवेद का विभाग आर्चिकों में और आर्चिक का विभाग अध्यायों में किया गया है ।।सामवेद में कुल ३ आर्चिक हैं ---(१)छंद आर्चिक जिसे पूर्वार्चिक भी कहते हैं , (२)महानाम्न्यार्चिक और (३) उत्तरार्चिक ।
छंद आर्चिक या पूर्वार्चिक को अध्यायों में और अध्याय को दशतियों में विभाजन किया गया है ।महानाम्न्यार्चिक के और उपविभाग नहीं हैं ।उत्तरार्चिक को अध्यायों में और अध्याय को सूक्तों में विभाजन किया गया है ।
पूर्वार्चिक के ६ अध्यायों को ६४ दशतियों में बांटा गया है ।पूर्वार्चिक में कुल ६४० मंत्र हैं ।
महानाम्न्यार्चिक में १० मंत्र हैं ।
उत्तरार्चिक में कुल २२ अध्याय हैं ।इन २२ अध्यायों में कुल ४०२ सूक्त हैं , जिनमें १२२५ मंत्र हैं ।
सामवेद में कुल १८७५ मंत्र हैं ।


अथर्ववेद का विभाग कांडों और सूक्तों में किया गया है ।
अथर्ववेद में २० कांड है ।
इन कांडों का विभाजन सूक्तों में किया गया है ।
अथर्ववेद के ७३१ सूक्तों में ५९७७ मंत्र हैं ।

वेद के विषय

वेद में लौकिक और पारलौकिक सभी विषयों का उपदेश दिया गया है । मनुष्य धर्मं ,अर्थ और काम की सिद्धि प्राप्त कर सके , इसलिए ईश्वर ने उसे लौकिक विषयों का उपदेश दिया है । धर्मं , अर्थ और काम की सिद्धि के पश्चात् मानव मुक्ति की और भी बढ़ सके , मुक्ति प्राप्त कर सके इस उद्देश्य से पारलौकिक , आध्यात्मिक ज्ञान का उपदेश दिया है ।

लौकिक विषयों के उपदेश से कई लाभ है । लौकिक विषयों के उपदेश से ही तो मनुष्य को इस जीवन में सुख पूर्वक रहने का ज्ञान प्राप्त हो सकता है । बिना इस संसार के बारे में जाने - बूझे कोई व्यक्ति कैसे सुखी रह सकता है ? जैसे , किसी को स्वास्थ्य के नियमों का ज्ञान नहीं होगा तो वह बीमार रहेगा और दुःख पाएगा । जिसे लेन -देन का ज्ञान नहीं होगा उसका धन कोई ठग ले जाएगा । जिसे धन कमाने नहीं आएगा उसेभूखे मरना पड़ेगा , आदि - आदि । इन सभी के बारे में वेद उपदेश है ।

वेद में , मनुष्य की शरीर रचना , आरोग्य विज्ञान , चिकित्सा विज्ञान , प्राणि शास्त्र , वनस्पति विज्ञान , रसायन विज्ञान , भौतिक विज्ञान , गणित आदि विज्ञान की जितनी भी शाखा -उपशाखाएँ आज के वैज्ञानिक जानते हैं वे सभी तो है ही इनके अतिरिक्त ऐसे विज्ञान भी हैं जिनका पता आज के वैज्ञानिकों को नहीं है ।शिल्प कला , शिक्षण कला , संगीत कला , आदि सभी कलाओं का उपदेश भी वेद में पाया जाता है । नक्षत्र विद्या , कृषि विद्या , वाणिज्य विद्या आदि का वर्णन भी वेद में पाया जाता है । वेद सभी विद्याओं के ग्रन्थ हैं ।

वेद में जादू - टोने , झाड़ -फूंक , इन्द्रजाल आदि विद्याओं का वर्णन नहीं है । वेद में केवल सत्य विद्याओं का ही उपदेश है । वेद में मिथ्या विद्याओं का उपदेश नहीं है । मिथ्या विद्या उसे कहते हैं ---जो मानव को मिथ्या ज्ञान कराएँ अर्थात झूठा ज्ञान दें । जो चीज हो ही नहीं उसे होने का आभास करा दे । वास्तविक को अवास्तविक और अवास्तविक को वास्तविक होने का विश्वास दिला दे । जैसे --इंद्रजाल के द्वारा जो चीज न हो उसे प्रत्यक्षदिखा देते हैं । जैसे --किसी को बातों ही बातों में मोह लेना और उसका धन छल कपट से ले लेना । ये मिथ्या विद्याएँ कहलाएंगी ।

वेद में इतिहास नहीं है । वेद में इतिहास होने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता है । जब ईश्वर ने मनुष्य को बनाया उसी समय वेद का उपदेश भी दिया । अतः उस समय इतिहास की कोई बात हो ही नहीं सकती थी । इसीलिए वेद में इतिहास नहीं है ।

 वेद में किस्से कहानियां भी नहीं हैं । वेद में विशुद्ध ज्ञान के विषय ही है ।

पारलौकिक विद्या का अर्थ होता है -- वह विद्या जिसमें इस मानव जीवन के पहले या इसके बाद की स्थिति -परिस्थितियों का वर्णन हो । या यों कहें कि जन्म से पहले और मृत्यु के बाद की स्थिति के विषय । वेद में पारलौकिक विद्या के बारे में अनेक बातें बतलाईं गईं हैं । पाप -पुण्य , मृत्यु के पश्चात् कर्म फल के भोग के बारे में , पुनर्जन्म , मोक्ष आदि के बारे में वेद में उपदेश है ।

अध्यात्म विद्या -
जो विद्या आत्मा के बारे में बतलाती है उसे अध्यात्म विद्या कहते हैं । अध्यात्म विद्या में आत्मा परमात्मा सम्बन्धी ज्ञान का उपदेश होता है । वेद में अध्यात्म विद्या का पूरी तरह प्रतिपादन किया गया है । आत्मा जन्म धारण क्यों करता है ? वह विभिन्न योनियों में क्यों जाता है ? कैसे जाता है ? आत्मा की उन्नति कैसे होती है ? वह मुक्ति कैसे प्राप्त करता है ? मुक्ति की अवस्था में आत्मा की स्थिति कैसी होती है ? आत्मा का स्वरुप कैसा है ? उसके गुण , कर्म और स्वभाव कैसे है ? परमात्मा का स्वरुप कैसा है ? परमात्मा सृष्टि रचना क्यों करता है ? परमात्मा के स्वरुप के ज्ञान से ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है ; अन्य कोई उपाय नहीं है , आदि बातों का वेद में उपदेश किया गया है ।

आत्मा की उन्नति के लिए वेद में कई उपाय बतलाए गए हैं ।
आत्मा की उन्नति के लिए सरल हृदय से ईश्वर की स्तुति , प्रार्थना और उपासना करनी चाहिए ऐसा वेद में बतलाया गया है ।

मनुष्य धर्मं का पालन करे , धर्मं का पालन करते हुए धन कमाए , धर्म पूर्वक कमाए हुए धन से अपने जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करे , अपना मानव जीवन सफल बना सके , और इनके आधार पर ही मुक्ति पथ का पथिक बनकर मुक्ति की प्राप्ति कर सके , इसके लिए आवश्यक सभी ज्ञान -विज्ञान , विद्याओं आदि का पूरा -पूरा वर्णन वेद में किया गया है ।

वैदिक ज्ञान पूर्णतः तर्क संगत है । वेद में किसी विषय का तर्क संगत ज्ञान ही दिया गया है । जो तर्क के विरुद्ध हैं , ज्ञान -विज्ञान के विरुद्ध हैं , बुद्धि के विपरीत हैं , प्रकृति के नियमों के विपरीत हैं , ऐसी बातें , ऐसा वर्णन , ऐसा उपदेश वेद में नहीं है ।

वैदिक भाष्य और और वेद के मुख्य भाष्य

वैदिक भाष्य और वेद के मुख्य भाष्य

पुरातन काल में वेदों के अनेक भाष्य प्रचलित थे । परन्तु आज कोई प्राचीन भाष्य नहीं मिलता है । हाँ ! इधर मध्य काल के तीन भाष्य अवश्य मिलते हैं ---उव्वट का भाष्य , महीधर का भाष्य और सायण का भाष्य । परन्तु आधुनिक युग में नव जागरण के अग्रदूत महान पुरोधा महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती ने जब वेदों का भाष्य किया तब उव्वट , महीधर और सायण के वेद भाष्य स्वामी दयानंद के वेद भाष्य के सामने धूमिल पड़ गए ।

 उव्वट , महीधर और सायण के वेद भाष्य के रहते हुए भी महर्षि दयानंद को वेद भाष्य करने की आवश्यकता पड़ी । इन भाष्यकारों द्वारा किए गए भाष्यों में अनेक गलतियाँ हैं ।वे वैदिक मन्त्रों का गलत अर्थ करते हैं ।जिससे वेद की महत्ता बहुत घट जाती है और वे अश्लील ग्रन्थ बन जाते हैं ।उन में ज्ञान विज्ञान की बातें कम हो जाता है ।ऐसी परिस्थिति में वेद मन्त्रों के ठीक -ठीक अर्थ बतलाने के लिए , वेद की महत्ता स्थापित करने के लिए , वेद ज्ञान -विज्ञान के ग्रन्थ हैं यह प्रमाणित करने के लिए , वेद में किस्से कहानियां , अश्लील बातें आदि नहीं हैं यह प्रमाणित करने के लिए महर्षि दयानंद को वेद- भाष्य करने की आवश्यकता पड़ी । महर्षि दयानंद ने अपने वेद- भाष्य की भूमिका में स्पष्ट रूप से लिखा है--- यह भाष्य ऐसा होगा कि जिससे वेदार्थ से विरुद्ध अबके बने भाष्य और टीकाओं वेदों में भ्रम से जो मिथ्या दोषों के आरोप हुए हैं वे सब निवृत्त हो जाएंगे ।

महर्षि दयानंद ने वेदों का अध्ययन किया था ।वेदांग अर्थात शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , ज्योतिष और छंद का अध्ययन किया था ।अन्य वैदिक शास्त्रों का भी गहन अध्ययन किया था । वेद में निहित ज्ञान कीगहराई को समझा था ।यही महर्षि दयानंद की विशेषता थी ।

उव्वट , महीधर और सायण में ये विशेषताएँ नहीं थीं ।
उव्वट , महीधर और सायण वेदों के विद्वान नहीं थे। इसलिए उनका वेद-भाष्य अनेक गलतियों , भ्रमों एवं असंगतियों से भरपूर है ।उन्होंने वेद के गहन अध्ययन के बिना ही वेद -भाष्य किया है ।अतः वेद में बतलाए गए ज्ञान को भी आगे और पीछे की बातों में मेल न दिखा सके ।


वे पुराणों के विद्वान थे । अतः जो भी वेद मंत्र उनके सामने होता था उसमें वे पौराणिक गाथाओं को ढूंढा करते थे । उनके वेद-भाष्य का आधार पुराण और पुराणों की कहानियां थी ।वे शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , ज्योतिष ,और छंद के आधार पर वेद मन्त्रों का अर्थ नहीं कर सकते थे ।

महर्षि दयानंद ने वेद -भाष्य के लिए पुराण और पुराणों की कहानियों का सहारा नहीं लिया ।
महर्षि दयानंद के वेद -भाष्य की अनेक विशेषताएँ हैं ।उन्होंने शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , ज्योतिष और छंद के आधार पर वेदों का भाष्य किया है ।इनके वेद -भाष्य में किसी प्रकार का आतंरिक विरोध नहीं दिखाई देता है , पूर्वापर पूर्णतया सामंजस्य है । महर्षि दयानंद के वेद -भाष्य द्वारा स्पष्ट रूप से ईश्वर की मान्यता के सम्बन्ध में , देवताओं के सम्बन्ध में , कर्मफल , पुनर्जन्म और मोक्ष के सम्बन्ध में , कर्त्तव्याकर्त्तव्य के सम्बन्ध में , भक्ति और उपासना के सम्बन्ध में , ज्ञान -विज्ञान के सम्बन्ध में निश्चित ज्ञान प्राप्त होता है । आधुनिक युग के ज्ञान -विज्ञान की सभी शाखाओं -उपशाखाओं का वेद में प्रतिपादन है ,यह स्पष्ट हो जाता है ।इस भाष्य से वेदों का सच्चा ईश्वरीय ज्ञान प्रकट हो गया है , वेदों का सर्वोपरीमहत्व प्रमाणित हो गया है ।

महर्षि दयानंद ने ऋग्वेद के सातवें मंडल के चौथे अनुवाक , इकसठवें सूक्त के मंत्र संख्या दो तक और पूरे यजुर्वेद का भाष्य किया है ।

ईश्वर एक है ,निराकार है , जन्म -मृत्यु के बंधन में नहीं आता है , वह सत् ,चित्त और आनंद है , सर्वशक्तिमान है , सृष्टि का कर्ता ,पालकऔर उपसंहार कर्ता है , वही सारी सृष्टि का स्वामी है , सर्व सद्गुण सम्पन्न है , सभी दुर्गुणों से रहित है , वह कर्मफल का भोक्ता नहीं है , आदि -आदि ।


ऋषि दयानंद ने वेद भाष्य में बतलाया है की ---जिनमें दिव्य शक्तियां हों वे देवता है : देवता चेतन या जड़ दोनों प्रकार के हो सकते है। देव का अर्थ विद्वान भी होता है ।सभी प्रकार की दिव्य शक्तियां ईश्वर में पुर्णरूपेण हैं । अतः ईश्वर ही सबसे बड़ा देव है , महादेव है । इन्द्र , वरुण , अग्नि , वायु जहाँ जड़ दिव्य शक्तियों के नाम हैं वहीँ विषय भेद से ईश्वर के नाम भी हो सकते है । माता , पिता , गुरु आदि साक्षात् चेतन देवी देवता हैं ।


महर्षि दयानंद के वेद -भाष्य के अनुसार वेद में सारी सत्य विद्याएँ भरी हैं , ज्ञान - विज्ञान की सभी बातें वेद में हैं , या यों कहें कि ज्ञान -विज्ञान की सारी बातें वेद से ही निकली हैं ।


दयानंद के वेद -भाष्य के आधार पर--- कर्मफल का भोग अवश्य होता है ;कर्मफल का भोग कर्ता को ही होता है ; ईश्वर से क्षमा याचना , प्रार्थना अथवा भोग आदि चढ़ा कर कर्मफल के भोग से नहीं बचा जा सकता है ; एक के द्वारा किए गए शुभ या अशुभ कर्मों के फलदूसरे को अर्पण नहीं किए जा सकते ।

वेद का अर्थ है ज्ञान

वेद का अर्थ है ज्ञान


वेद शब्द संस्कृत भाषा के “विद्” धातु से बना है । “विद्” का अर्थ है: जानना, ज्ञान इत्यादि । ‘वेद’ हिन्दू धर्म के प्राचीन पवित्र ग्रंथों का नाम है, इससे वैदिक संस्कृति प्रचलित हुई । ऐसी मान्यता है कि इनके मन्त्रों को परमेश्वर ने प्राचीन ऋषियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था । इसलिए वेदों को श्रुति भी कहा जाता है । वेद प्राचीन भारत के वैदिक काल की वाचिक परम्परा की अनुपम कृति है जो पीढी दर पीढी पिछले चार-पाँच हज़ार वर्षों से चली आ रही है । वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं । वेद के असल मन्त्र भाग को संहिता कहते हैं ।
वेद शब्द का अर्थ है - ज्ञान।
वेद --मन्त्रों को ऋचा कहते हैं । अन्य ग्रंथों के मन्त्रों को ऋचा नहीं कहा जा सकता ।जो विद्वान किसी वेद मंत्र का नया अर्थ ढूंढ़ निकाले उसे ऋषि कहते हैं ।
प्रत्येक ऋचा के अनेक अर्थ हो सकते हैं। एक विद्वान एक ऋचा से किसी एक ज्ञान को प्राप्त करता है, उसका एक अर्थ निकालता है ।परन्तु एक दूसरा विद्वान जब उसी ऋचा को पढ़ता है तब उसे एक नए अर्थ , नए ज्ञान की प्राप्ति होती है ।अतः ये दोनों विद्वान ऋषि कहलाएंगे । उसी ऋचा का कोई तीसरा विद्वान एक अन्य नया अर्थ निकालता है नए ज्ञान को प्राप्त करता है तो उसे भी ऋषि कहा जाएगा। इस प्रकार एक ही ऋचा के अनेकों ऋषि हो सकते हैं । उन ऋषियों ने एक ही वेद मंत्र के अलग -अलग , नए - नए अर्थ निकाले हैं ।

एक ही ऋचा के भिन्न -भिन्न अनेक अर्थ हो सकते हैं । परन्तु उनका अर्थ परमात्मा के गुण- कर्म और स्वभाव के विपरीत नहीं होना चाहिए ।

प्रत्येक वेद- मंत्र का देवता भी होता है ।देवता कहते हैं उस वेद मंत्र में प्रतिपादित विषय को ।अर्थात उस मंत्र में किस विषय का ज्ञान दिया गया है ।

एक ऋचा के अनेक देवता हो सकते हैं ।
एक ही ऋचा के अर्थ जब भिन्न- भिन्न ऋषि करते हैं ,तब उनके अर्थों में भिन्नता आ जाती है ।अर्थ अलग -अलग होने से विषय भी अलग हो जाते हैं ।विषय की भिन्नता के कारण एक ही ऋचा के कई देवता हो सकते हैं ।

वेद उन ग्रंथों को कहते हैं जिनमें ज्ञान -विज्ञानं की सभी बातें बीज रूप में हैं ।
बीज रूप में कहने का अर्थ है---वेद में ज्ञान -विज्ञानं की सारी बातें बहुत कम शब्दों में कही गई है । अर्थात छोटे में कही गई है । बड़े - बड़े विद्वान वेद पढ़ कर उसमें निहित गूढ़ ज्ञान को समझ लेते हैं और अपने शिष्यों को समझते हैं ।
जैसे बीज में पूरा पेड़ समाया होता है ,जब बीज को मिटटी में बोया जाय , उसे पानी मिले , तब उससे अंकुर निकलता है और विशाल पेड़ बन जाता है। वैसे ही जब वेद मन्त्रों को ऋषियों की मस्तिष्क रुपी ऊर्वरा भूमि मिलती है , वे उन मन्त्रों पर विचार करते हैं तब उस वेद मंत्र में निहित ज्ञान को समझ लेते हैं और व्याख्या करते हैं । इस प्रकार शिष्यों को वेद का ज्ञान प्राप्त होता है ।

वेद चार हैं । उनके नाम हैं -----ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद ।

वेद का ज्ञान परमपिता परमेश्वर ने दिया है । परमेश्वर ने वेद का ज्ञान मानवी - सृष्टि के आदि काल में ही दिया ।
परमात्मा ने सृष्टि के आदि काल में स्वयं उत्पन्न चार ऋषियों को वेद का ज्ञान दिया । उन चार ऋषियों के नाम थे ---अग्नि , वायु , आदित्य और अंगिरा।ऋग्वेद का ज्ञान अग्नि ऋषि को , यजुर्वेद का ज्ञान वायु ऋषि को , सामवेद का ज्ञान आदित्य ऋषि को और अथर्ववेद का ज्ञान अंगिरा ऋषि को दिया गया ।
 निराकार ईश्वर ने ऋषियों को वेद का ज्ञान दिया ।
जैसे एक योगी अपना सन्देश दूर स्थित किसी दूसरे योगी के हृदय तक पहुंचा देता है उसी प्रकार परमयोगी परमात्मा ने वेद का ज्ञान उन चारों ऋषियों के हृदय में पहुंचा दिया ।
उन चारों ऋषियों ने वेद ज्ञान का उपदेश ब्रह्मा नाम के एक ऋषि को दिया । ब्रह्मा ने वेद का उपदेश अपने शिष्यों को दिया । उनके शिष्यों ने अपने शिष्यों को । इस प्रकार वेद का ज्ञान मानव समाज को गुरु - शिष्य परंपरा से प्राप्त होता रहा ।

उन चारों ऋषियों ने वेद को लिखा नहीं था ।
उनहोंने वैदिक ज्ञान का उपदेश ब्रह्मा के प्रति किया ।
ब्रह्मा ने सुनकर याद कर लिया ।
ब्रह्मा ने उसका उपदेश अपने शिष्यों के प्रति किया ।
शिष्यों ने सुनकर याद कर लिया और पुनः उन्होंने अपने शिष्यों को उसका उपदेश किया ।
इस प्रकार वेद का ज्ञान गुरु द्वारा शिष्य को सुनकर प्राप्त होता रहा । इसीलिए वेद को श्रुति भी कहते हैं ।

द्वापर युग के अन्तिम दिनों में वेद को लिपिबद्ध किया गया ।
वेद को ऋषिवर व्यास ने लिपिबद्ध किया ।
महर्षि व्यास ने देखा कि वेद के अध्ययन में अब लोग प्रमाद करने लगे हैं । लोगों में वेद पढ़ने की रूचि नहीं रह गई है ।
अतः कुछ समय पश्चात् वेद का ज्ञान लुप्त हो जाएगा ।
इसीलिए उन्होंने वेद को लिपिबद्ध किया ।
इस प्रकार वेद का ज्ञान सदा के लिए सुरक्षित हो गया ।
वेद व्यास को वेद के सारे मंत्र कंठस्थ नहीं थे ।
परन्तु जब उन्होंने वेदों का संकलन करने का निश्चय काया तब ऋषियों के पास जा -जा कर उन्होंने वेद मन्त्रों का संग्रह किया ।

परमात्मा ने मानव को इस धरती पर सुखपूर्वक जीवन निर्वाह कर सकने तथा मोक्ष प्राप्त कर सकने के लिए करुणा पूर्वक वेद का उपदेश दिया ।
मानव जीवन के लक्ष्य ---धर्मं , अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए परमात्मा ने वेद का उपदेश दिया ।


वेद मन्त्रों को पढ़कर उसे सभी व्यक्ति नहीं समझ सकते हैं ।
जिसने वेदांग , अर्थात शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , ज्योतिष और छंद का विधिवत अध्ययन किया हो वही वेद मन्त्रों के अर्थ समझ सकता है । वेद के विद्वान ऋषियों द्वारा वेद के भाष्य किए गए हैं ।उन्हें पढ़कर जन साधारण वैदिक शिक्षा से लाभ उठा सकता है ।

।। श्री शुकदेव चालीसा ।। रचनाकार- अशोक "प्रवृद्ध"

                                                      ।। श्री शुकदेव चालीसा ।।                                              रचनाकार- अशोक ...